सौर आंधी की वज़ह से कड़कती है बिजली



बिजली
एक अध्ययन के मुताबिक़ सूरज पर होने वाली गतिविधियों की वज़ह से धरती पर बिजली गिरती है.
वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया है कि तेज़ गति के सौर कणों का झोंका जब वायुमंडल में प्रवेश करता है तो बिजली बोल्ट की संख्या बढ़ जाती है.
यह शोध इनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ है.
अब जबकि सूरज पर होने वाली गतिविधियों पर सैटेलाइट के द्वारा बारीकी से नज़र रखी जाती है इसलिए यह संभव है कि सौर कणों की ख़तरनाक आंधी के धरती के वायुमंडल से टकराए जाने का पूर्वानुमान लगाया जा सके.

प्रभाव

यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रमुख शोधकर्ता डॉ क्रिस स्कॉट ने कहा, " बिजली काफ़ी ख़तरनाक होती है. हर साल 24 हज़ार लोग बिजली के आघात से मारे जाते हैं. इसलिए सौर कणों की आंधी की कोई भी पूर्व चेतावनी काफ़ी उपयोगी साबित होगी. "
सौर आंधी
सौर कणों की आंधी के धरती के वातावरण में प्रवेश करने के साथ ही उत्तरी ध्रुव पर प्रकाश फैल सकता है, लेकिन शोध बताता है कि कैसे ये मौसम को भी प्रभावित कर सकता है.
डॉ स्कॉट ने कहा, " सौर आंधी लगातार एक जैसी नहीं रहती, यह तेज़ और धीमी होती रहती है. चूंकि सूरज घूमता रहता है इसलिए ये धाराएँ एक दूसरे का पीछा करती रहती है इसके चलते यदि तेज़ सौर आंधी का पीछे धीमी सौर आंधी है तो इससे सौर कणों की सघनता बढ़ जाती है. "
वैज्ञानिकों ने पाया कि जब सौर कणों की आंधी की गति और प्रबलता बढ़ती है तो बिजली गिरने की दर भी बढ़ जाती है.
शोधकर्ता दल ने कहा, " सौर कणों के धरती के वातावरण से टकराने के बाद एक महीने तक मौसम अशांत रह सकता है. "

प्रक्रिया

शोधकर्ताओं ने उत्तरी यूरोप के आकड़ों का इस्तेमाल करके यह पाया कि 400 दिनों में 321 बिजली गिरने की घटना की तुलना में तेज़ गति वाले सौर आंधी के बाद 400 दिनों में औसतन 422 बिजली गिरने की घटना हुई.
उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश
डॉ स्कॉट ने कहा, " यह चौंकाने वाला परिणाम था क्योंकि पहले यह सोचा गया था कि सौर आंधी में बढ़ोत्तरी का उल्टा असर होगा. "
शोधकर्ता दल इसकी प्रक्रिया को लेकर वास्तव में आश्वस्त नहीं है लेकिन उन्होंने कहा कि सौर कण बादलों में प्रवेश करके विद्युत ऊर्जा को बिजली में तब्दील कर देता है.
हालांकि इसकी प्रक्रिया से संबंधी सवालों के जवाब अभी भी अधूरे हैं. लेकिन सौर कणों के पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने से संबंधी बहुत सी जानकारियां मौजूद हैं जो सौर आंधी की भविष्यवाणी करने में मदद कर सकती हैं
अध्ययन के आंकड़े यूरोप में इकट्ठे किए गए है लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका प्रभाव विश्वव्यापी होगा.

सबसे ख़तरनाक डायनोसोर 'पिनोकियो'?


नया टायरेनोसोरस
लंबी नाक वाले एक नए टायरेनोसोरस डायनोसोर का पता चला है. शोधकर्ताओं ने इसे 'पिनोकियो रेक्स' नाम दिया है.
नौ मीटर लंबा, ख़ास तरह की नुकीली नाक वाला यह उग्र मांसभक्षी 'टायरेनोसोरस रेक्स' ही प्रजाति का बताया जा रहा है.
'पिनोकियो रेक्स' का कंकाल चीन में सड़क निर्माण के दौरान की गई खुदाई में पाया गया है. इसकी पहचान ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने की है.
6.6 करोड़ साल पुराने इस हिंसक जानवर को आधिकारिक रूप से 'कियांझाऊसोरस साइनेंसिस' रखा गया है.

ऑनलाइन साइंस जर्नल 'नेचर कम्युनिकेशन' में इसका ज़िक्र किया गया है. 'पिनोकियो' दूसरे टायरेनोरस से अलग दिखता है.

पिनोकियो की लंबी नाक

एडिनबरा विश्वविद्यालय के डॉक्टर स्टीव ब्रूसेट ने बताया, "इसके दांत तो टी. रेक्स से मिलते जुलते हैं, लेकिन इसकी नाक ज्यादा लंबी और पतली है, जिसके अगले सिरे पर कांटों की कतार दिखती है."
नए टायरेनोसोरस का कंकाल
स्टीव ब्रुसेट ने आगे कहा, "हो सकता है कि ये आपको कुछ हास्यास्पद दिखाई दे, लेकिन ये किसी भी अन्य टायरेनोसोरस की तरह ही खूंखार होता, बल्कि संभव है कि उनसे ज़्यादा फुर्तीला और छिप कर वार करने वाला हो."
उन्होंने कहा, "हमें इसे पुकारने के लिए एक नाम चाहिए था. इसकी लंबी नाक देखकर हमें पिनोकियो याद आ गया, इसलिए हमने इसे यही नाम दिया है."
शोधकर्ताओं का अब मानना है कि एशिया में डायनोसोर के क्रिटेशियस युग के अंतिम दिनों में, जो कि डायनोसोर के भी अंतिम दिन थे, शिकार करने वाले कई अलग-अलग तरह के टायरेनोसोरस होते थे.
तेरह मीटर तक लंबे विशालकाय टर्बोसोरस के टी. रेक्स जितने गहरे और शक्तिशाली जबड़े थे जो बड़े-बड़े शाकाहारियों की हड्डी चबा जाने की ताकत रखते थे.
जबकि नौ मीटर लंबे कियांझाऊसोरस के बारीक दांतों को देखकर ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ये पंख वाले डायनोसोर और छिपकली जैसे छोटे जीव-जंतुओं को अपना शिकार बनाता था.

टायरोनोसोर की नई प्रजाति

पिनोकियो की नाक का आकार अपनी तरह के जानवरों की अपेक्षा 35 फीसदी बड़ा था, लेकिन उसका चेहरा आखिर इतना लंबा क्यों है?
खुदाई स्थल पर दो वैज्ञानिक
डॉक्टर ब्रुसेट ने बीबीसी को बताया, "हक़ीक़त ये है कि हम इसका कारण अब तक पता नहीं लगा पाए हैं, लेकिन ज़रूर यह किसी खास गतिविधि के कारण होगा."
वो बताते हैं, "यह नया डायनोसोर हल्का और अपेक्षाकृत कमजोर मांसपेशियों वाला था. संभवतः यह ज़्यादा तेज़ी से अपने शिकार पर झपटता होगा. टायरेनोसोरस टी. रेक्स सभी डायनोसोर में सबसे ख़तरनाक और घातक है."
पिनोकियो के सामने आने से विचित्र टायरनोसोरस के एक के बाद एक मिल रहे जीवाश्मों पर चल रही बहसों पर विराम लगता दिखता है.
टायरेनोसोरस उद्भव का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर ब्रुसेट ने बताया, ''कियांझाऊसोरस का नमूना एक वयस्क का है और इसे खुदाई के समय बहुत संभाल कर निर्माण करने वाले मज़दूरों ने निकाला.''
इसे दक्षिणी चीन में गंझाऊ के नज़दीक सड़क निर्माण के दौरान खुदाई में पाया गया था. जहां तक पिनोकियो की नाक का सवाल है, वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे हैं कि इसके जबड़े के जैव रासायनिक अध्ययन से इसका जवाब मिल सकेगा.

हाल के वर्षों में मंगोलिया में खुदाई के दौरान दो असाधारण कंकाल मिले हैं. इन्हें टायरेनोसोरस प्रजाति की बिलकुल नई शाखा से संबंधित माना जा रहा है.

सूरज के पास जाने की तैयारी


ब्रिटिश कंपनी बनाएगी सौर कक्षा में भेजने वाला उपग्रह
ब्रिटेन उस अंतरिक्ष यान को बनाने की प्रक्रिया का नेतृत्व करेगा जो सूर्य की कक्षा में उसके चारों ओर चक्कर लगाएगा.
ये अंतरिक्ष यान बुध ग्रह की कक्षा के भीतरी ओर से तस्वीरें लेगा, जिससे सूर्य की भीतरी गतिविधियों के स्रोत का पता चल सकेगा.
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने ब्रिटेन की कंपनी एस्ट्रियम यूके से इस उपग्रह को बनाने का समझौता किया है जिसे वर्ष 2017 में प्रक्षेपित करने की योजना है.
ये सौदा तीस करोड़ यूरो यानी लगभग पच्चीस करोड़ पौंड में हुआ है.
पेरिस स्थित इस एजेंसी का ब्रिटेन की किसी कंपनी से ये अब तक के सबसे बड़े सौदों में से एक है.
इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो ये समझौता लगभग ऐसे समय पर हुआ है जब अंतरिक्ष के क्षेत्र में ब्रिटेन की गतिविधियों के पचास साल पूरे हुए हैं.
26 अप्रैल 1962 को एरियल-1 उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ ही ब्रिटेन अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने वाले देशों में शामिल हुआ.
सूर्य की कक्षा में प्रक्षेपित होने के बाद ये उपग्रह सूर्य परिवार के काफी नजदीक तक पहुंच जाएगा.
ये सूर्य से करीब चार करोड़ 20 लाख किलोमीटर की दूरी के दायरे में निकटता बनाएगा ताकि वैज्ञानिक सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा का अध्ययन कर सकें.

समस्या

एस्ट्रियम यूके में विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. राल्फ कॉर्डे का कहना है कि इस अभियान में ऊष्मा या गर्मी एक बड़ी समस्या है.
"हम इतने ज्यादा तापमान को सहने वाली एक शील्ड तैयार करेंगे जो इस तापमान को कम कर सके"
डॉ. राल्फ कॉर्डे, वैज्ञानिक
उन्होंने कहा, ''इसे पर्याप्त सुरक्षित बनाने की जरूरत है, क्योंकि इस अंतरिक्ष यान को पांच सौ डिग्री तापमान सहन करना होगा, जो पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में विनाशकारी हो सकता है.''
उनका कहना था, ''हम लोग इतने ज्यादा तापमान को सहने वाली एक शील्ड तैयार करेंगे जो इस तापमान को कम कर सके.''
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस मिशन से ये जानकारी भी मिल सकेगी कि कैसे सूर्य के चारों ओर हीलियोस्फियर का निर्माण होता है जिसकी वजह से सूर्य के चारों ओर का तापमान इतना ज्यादा होता है.
ये मिशन यूरोपीय स्पेस एजेंसी और अमरीकी स्पेस एजेंसी अर्थात् नासा का संयुक्त उपक्रम है. नासा इस मिशन को रॉकेट जैसे उपकरण प्रदान करेगा.
source bbc hindi

आधुनिक शेरों की उत्पत्ति की कहानी



शेर
आधुनिक शेरों की उत्पत्ति और इतिहास का वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया है.
जीवित शेरों और म्यूज़ियम में मौजूद नमूनों के जेनेटिक विश्लेषण से पता चला है कि आधुनिक शेरों के सबसे क़रीबी पूर्वज 1,24,000 वर्ष पूर्व तक जीवित थे.
आधुनिक शेरों का विकास दो समूहों में हुआ. एक समूह पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में चला गया और दूसरा समूह पश्चिमी अफ्रीका और भारत.
दूसरे समूह के शेर अब लुप्तप्राय हैं. इसका मतलब हुआ कि आधुनिक शेरों की आधी जैव विविधता खत्म होने की कग़ार पर पहुंच चुकी है.
इस अध्ययन के नतीजों को  बीएमसी इवोल्यूशनरी बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित किया गया है.
शेरों के इतिहास को खोजना बेहद कठिन कार्य रहा है. हाल का समय इस प्रजाति के लिए काफी मुश्किल भरा रहा है क्योंकि इंसानी गतिविधियों के चलते उनके अस्तित्व पर संकट छा गया है.
जीवाश्म रिकॉर्ड में निरंतरता का अभाव और शेरों के बिखरे आवास वाले इलाके इतिहास की कड़ी को जोड़ने में सबसे बड़ी बाधा रहे हैं.

उद्भव

इसलिए वैज्ञानिकों के अंतरराष्ट्रीय समूह ने दुनियाभर के म्यूज़ियमों और संग्रह केंद्रों में शेरों की प्राचीन डीएनए को खोजना शुरू किया.
इंग्लैंड के डरहम विश्वविद्यालय से जुड़े डॉ. रॉस बर्नेट के नेतृत्व में इस टीम ने विभिन्न प्रजातियों की डीएनए का अध्ययन किया.
टीम ने विलुप्त हो चुके उत्तरी अफ़्रीका के बारबेरी शेर से लेकर विलुप्त इरानी और मध्य व पश्चिमी अफ़्रीकी शेरों के नमूनों का अध्ययन किया.
शोधकर्ताओं ने एशिया और अफ़्रीका के अन्य हिस्सों में जीवित शेरों के डीएनए से प्राचीन डीएनए का मिलान किया और पता लगाने की कोशिश की कि विभिन्न प्रजातियों का विकास कैसे हुआ.
अध्ययन में खुलासा हुआ कि इस समय शेरों की जो एकमात्र प्रजाति पैंथेरा लियो मौजूद है, वो पहली बार पूर्वी-दक्षिणी अफ़्रीका में दिखी थी.
लगभग 1,24,000 वर्ष पूर्व विभिन्न प्रजातियों का विकास शुरू हो गया था.

अनुवांशिक अंतर

यह वही समय है जब उष्णकटिबंधीय जंगलों का पूरे ध्रुवीय अफ़्रीका में प्रसार हुआ और सहारा क्षेत्र सवाना में बदल गया.
महाद्वीप के दक्षिण और पूर्व रहने वाले शेर अलग हो गए और उनका विकास पश्चिमी व उत्तरी हिस्से में रहने वाले शेरों से अलग होना शुरू हुआ.
इससे दोनों शेरों के बीच आया अनुवांशिक अंतर आज भी मौजूद है.
"पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेर सोमालिया या बोत्सवाना की अपेक्षा भारतीय शेरों की प्रजाति से ज्यादा मिलते जुलते हैं."
डॉ. रॉस बर्नेट, शोधकर्ता
51,000 वर्ष पूर्व महाद्वीप सूख गया और सहारा का प्रसार हुआ. इससे उत्तर और दक्षिण का इलाका अलग हो गया.
इसी समय पश्चिम में रहने वाले शेरों की पहुंच मध्य अफ़्रीका तक हो गई, जो वहां रहने के ज्यादा अनुकूल था.
तबसे नील समेत अफ़्रीका की बड़ी नदियां इन शेरों को अलग करने में बड़ी बाधा बनी रहीं.
प्राचीन डीएन के अध्ययन से यह भी खुलासा हुआ कि आधुनिक शेरों की प्रजाति ने 21,000 वर्ष पहले अफ़्रीका से बाहर की यात्रा शुरू की और अंततः भारत पहुंचे.
इसके बहुत बाद, लगभग 5,000 वर्ष पूर्व शेरों का एक और समूह महाद्वीप से बाहर गया और मध्यपूर्व में स्थित ईरान में पहुंचा.
ये शेर अब लुप्त हो चुके हैं.

बारबेरी प्रजाति

भारत के काठियावाड़ में 400 से भी कम एशियाई शेर (पी. लियो पर्सिका) बचे हैं. इस प्रजाति को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर द्वारा लुप्तप्राय घोषित किया जा चुका है.
डॉ. बर्नेट ने बताया, ''पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेर सोमालिया या बोत्सवाना की अपेक्षा शेरों की भारतीय प्रजाति से ज्यादा मिलते जुलते हैं.''
दोनों के बीच भारी भौगोलिक दूरी के बावजूद इनमें ईरानी शेरों और उत्तरी अफ़्रीका के बारबेरी शेरों से ज्यादा समानता दिखती है.
डॉ. बर्नेट ने बताया, ''यह जानकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि लुप्त बारबेरी शेरों और उत्तरी अफ़्रीका व भारतीय शेरों के बीच बहुत नज़दीकी रिश्ता है.''
अपने आकार और गुम इतिहास के चलेत विशाल मांसभक्षी जानवरों में बारबेरी शेर ज्यादा रहस्यमय हैं.
कभी उत्तरी अफ़्रीका में बहुतायत में पाए जाने वाले बारबेरी शेर शारीरिक रूप से एशिया और अफ़्रीका में अन्य जगहों पर पाए जाने वाले शेरों से विशिष्ट थे.
अभी तक ये निश्चित नहीं है कि कोई बारबेरी शेर ज़िंदा है या नहीं और संरक्षणवादी इस उप-प्रजाति को फिर से जीवित करने की कोशिश में हैं.

संरक्षण

साक्ष्य बताते हैं कि कुछ शेर मोरक्को के शाही परिवार के संग्रह के हिस्से के रूप में बचे हो सकते हैं.
हालांकि पूर्व में हुए शोध और ताज़ा अध्ययन से पता चलता है कि वो असली बारबेरी शेर नहीं थे.

ऐसे सुलझी गुत्थी

  • ब्रिटेन के टॉवर ऑफ लंदन में कभी कैद रखे गए दो बारबेरी शेरों की हड्डियों से गुत्थी सुलझी.
  • टॉवर में इन शेरों का संरक्षित कंकाल खोजा गया.
  • लुप्त हो चुके गुफ़ा शेरों का यह सबसे आधुनिक प्रमाण है.
  • ये 14वीं और 15वीं शताब्दी तक जीवित थे.
  • इस कंकाल के डीएन ने ही वैज्ञानिकों को बारबेरी और भारतीय शेर के बीच करीबी संबंध को खोजने में मदद की.
यदि ऐसा है और बारबेरी शेर खत्म हो चुके हैं तो नए अध्ययन का नजीजा बताता है कि अनुवांशिक रूप से ज्यादा करीबी रहे भारतीय शेरों को उनके प्राकृतिक आवास में पुनः भेजा जा सकता है.
डॉ. बर्नेट के अनुसार, भविष्य में उत्तरी अफ़्रीका में शेरों को ले जाना एक जटिल प्रक्रिया होगी. ऐसे में उनका प्रजनन एक तरीका हो सकता है.
अफ़्रीका के शेरों की लगभग एक तिहाई संख्या पिछले 20 वर्षों में ग़ायब हुई है.
शोधकर्ता पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेरों को लेकर सबसे ज़्यादा चिंता जताते हैं, जो कि लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं. इन दोनों इलाकों में क्रमशः 400 से 800 और 900 शेर बचे हुए हैं.
इन प्रजातियों के कुछ शेरों को चिड़ियाघरों में संरक्षित कर रखा गया है.

अब सिंथेटिक क्रोमोसोम तैयार


ख़मीर क्रोमोसोम
जैविक इंजीनियरिंग में एक बड़ी छलांग लगाते हुए वैज्ञानिकों ने ख़मीर का पहला सिंथेटिक गुणसूत्र (क्रोमोसोम) तैयार किया है.
इससे पहले अब तक सिंथेटिक डीएनए बैक्टीरिया जैसे सरल जीवों के लिए बनाया गया था.
ख़मीर की जीवन रचना ऐसी है जिसकी कोशिकाओं का एक केंद्र होता है, जो पौधों और जानवरों से मिलता जुलता है. इसमें 2,000 जीन्स होते हैं.
इसलिए ख़मीर के पहले 16 गुणसूत्रों को तैयार करना उभरते हुए सिंथेटिक बायोलॉजी विज्ञान की 'बड़ी उपलब्धि' मानी जा रही है.
शोध में ख़मीर में मौजूद मूल गुणसूत्रों को सिंथेटिक गुणसूत्रों से बदल दिया गया. वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया गया गुणसूत्र ख़मीर में सफलतापूर्वक काम करने लगा.
इसके बाद वैज्ञानिकों ने ख़मीर के पुनरुत्पादन का भी निरीक्षण किया ताकि इसे व्यवहारिकता की कसौटी पर कसा जा सके.

'अप्रत्यक्ष खतरे'

शोध के लिए ख़मीर का प्रयोग बहुत उपयोगी माना जाता है. बेकिंग और मद्यकरण में ख़मीर का बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता है और भविष्य में इसके औद्योगिक इस्तेमाल की भी बहुत संभावनाएं हैं.
कैलिफ़ोर्निया में एक कंपनी पहले भी सिंथेटिक बायोलॉजी की मदद से ख़मीर की ऐसी किस्म तैयार कर चुकी है जो मलेरिया की दवा का एक तत्व, आर्टेमिसिनिन पैदा कर सकती है.
ख़मीर क्रोमोसोम
ख़मीर में गुणसूत्र-lll का संश्लेषण एक अंतर्राष्ट्रीय टीम द्वारा किया गया. बाद में इसके परिणामों को साइंस जर्नल में प्रकाशित भी किया गया. (ख़मीर के गुणसूत्रों का नाम सामान्यतः रोमन अंकों पर रखा जाता है.)
शोध में वैज्ञानिकों की टीम की अगुवाई करने वाले, लैनगोन मेडिकल सेंटर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के डॉक्टर जेफ़ बोएके का कहना है, "इससे सिंथेटिक बायोलॉजी की सुई सिद्धांत से हक़ीक़त की ओर बढ़ी है."
बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि शोध का परिणाम सच में रोमांचक है. उन्होंने कहा, "जिस हद तक हमने अनुक्रम बदले उसके बाद भी अंत में हमने स्वस्थ और खुश ख़मीर पाया."
नए गुणसूत्र को सिन-lll नाम दिया गया है. इसे बनाने में 273,871 डीएनए जोड़ों का इस्तेमाल किया गया है, जो ख़मीर के शरीर के मूल गुणसूत्र में मौजूद 316,667 डीएनए से थोड़ा कम है.
डॉक्टर बोएके ने बताया, "हमने उसके शरीर में 50 हज़ार से अधिक डीएनए कोड को बदल दिया था. इसके बावज़ूद ख़मीर न केवल साहसी निकला बल्कि उसने नए तरह के काम करने भी शुरू कर दिए. नए काम करने की तरक़ीब हमने उसके गुणसूत्र में मशीन की मदद से सिखाया."
ख़मीर के अंदर आए नए बदलाव का कारण रसायनिक परिवर्तन है, जिससे वैज्ञानिक उसके गुणसूत्रों में हज़ारों तरह की भिन्नता ला सकते हैं, जो जेनिटिक कोड को बदलने में मददगार होगा.
उम्मीद है कि ख़मीर के सिंथेटिक गुणसूत्रों की मदद से इसका प्रयोग उपयोगी टीकों और जीव ईंधन को बनाने में किया जा सकेगा.
आनुवांशिक संशोधन में एक जीव से दूसरे जीव के अंदर जीन को स्थानान्तरित किया जाता है, वहीं सिंथेटिक जीव विज्ञान में नए जीन का निर्माण किया जाता है.
मगर विज्ञान जगत से बाहर कुछ लोगों का मानना है कि इस शोध से वैज्ञानिक भगवान बनने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही वह इसके दूरगामी दुष्प्रभावों को नजरअंदाज़ कर रहे हैं.
ल्योड्स इंश्योरेंस बाज़ार ने 2009 में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि नई तकनीक के खतरे अप्रत्यत्क्ष होते हैं.

म्हत्वपूर्ण तिथि

भारत का इतिहास
पाषाण युग- 70000 से 3300 ई.पू
मेहरगढ़ संस्कृति7000-3300 ई.पू
सिन्धु घाटी सभ्यता- 3300-1700 ई.पू
हड़प्पा संस्कृति1700-1300 ई.पू
वैदिक काल- 1500–500 ई.पू
प्राचीन भारत- 1200 ई.पू–240 ई.
महाजनपद700–300 ई.पू
मगध साम्राज्य545–320 ई.पू
सातवाहन साम्राज्य230 ई.पू-199 ई.
मौर्य साम्राज्य321–184 ई.पू
शुंग साम्राज्य184–123 ई.पू
शक साम्राज्य123 ई.पू–200 ई.
कुषाण साम्राज्य60–240 ई.
पूर्व मध्यकालीन भारत- 240 ई.पू– 800 ई.
चोल साम्राज्य250 ई.पू- 1070 ई.
गुप्त साम्राज्य280–550 ई.
पाल साम्राज्य750–1174 ई.
प्रतिहार साम्राज्य830–963 ई.
राजपूत काल900–1162 ई.
मध्यकालीन भारत 500 ई.– 1761 ई.
दिल्ली सल्तनत
ग़ुलाम वंश
ख़िलजी वंश
तुग़लक़ वंश
सैय्यद वंश
लोदी वंश
मुग़ल साम्राज्य
1206–1526 ई.
1206-1290 ई.
1290-1320 ई.
1320-1414 ई.
1414-1451 ई.
1451-1526 ई.
1526–1857 ई.
दक्कन सल्तनत
बहमनी वंश
निज़ामशाही वंश
1490–1596 ई.
1358-1518 ई.
1490-1565 ई.
दक्षिणी साम्राज्य
राष्ट्रकूट वंश
होयसल साम्राज्य
ककातिया साम्राज्य
विजयनगर साम्राज्य
1040-1565 ई.
736-973 ई.
1040–1346 ई.
1083-1323 ई.
1326-1565 ई.
आधुनिक भारत- 1762–1947 ई.
मराठा साम्राज्य1674-1818 ई.
सिख राज्यसंघ1716-1849 ई.
औपनिवेशिक काल1760-1947 ई.