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जानलेवा हैं ये पौधे, फूल और फल


  • 29 अगस्त 2015
2014 में ब्रिटेन के देहात में एक बड़े फ़ार्म की देखरेख करने वाले माली की अचानक मौत हो गई. उसके शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था.
उसकी मौत क्यों हुई, इसकी वजह का पता नहीं चल पा रहा था. लेकिन मुकदमे के दौरान सबूत पेश हुए कि उसकी मौत फूलों के एक लोकप्रिय पौधे की वजह से हुई.
इस फूल वाले पौधे का नाम है एकोनिटम. इसके खिले हुए फूल के कई नाम हैं जैसे - भेड़िए का दुश्मन, शैतान की हेलमेट, क्वीन ऑफ़ प्वायजन्स.
इन नामों से इसकी ख़ासियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. सच यही है कि एकोनिटम दुनिया का सबसे ख़तरनाक पौधा है क्योंकि ये हार्ट की गति को धीमा कर देता है जिससे मौत हो जाती है.
इसका सबसे ज़हरीला हिस्सा होता है जड़. लेकिन पत्तों में भी ज़हर होता है. दोनों में न्यूरोटॉक्सिन होते हैं, यानी वो ज़हर जो दिमाग पर असर करता है. इसे त्वचा भी सोख सकती है.

कड़ी ने ली जान

जब ये फूल, पत्ते या इसकी जड़ त्वचा से संपर्क में आते हैं तो वहाँ झुनझुनी पैदा होती है, वह हिस्सा अकड़ने लगता है. अगर ग़लती से इसे खा लिया जाए तो उल्टी और दस्त का दौर शुरू हो जाता है.
2010 में ब्रिटेन में भारतीय मूल की एक महिला लखवीर सिंह को हत्या का दोषी पाया गया था. उन्होंने अपने प्रेमी को कड़ी में इंडियन एकोनाइट मिला कर दे दिया था.
इसके कारण प्रेमी की पाचन शक्ति तो गड़बड़ा ही गई, साथ ही उसके हृदय की गति धीमी हो गई जिसके चलते उसकी मौत हो गई.
लेकिन हर बार ऐसा हो, ये जरूरी नहीं है. विशेषज्ञ जॉन रॉर्बटसन के मुताबिक हमारी उल्टी करने की क्षमता के कारण कई लोग अपनी कहानी बताने के लिए बच भी जाते हैं.
राबर्टसन कहते हैं, "मैंने उन लोगों से बात की है, जो इसे खाने के बाद भी जीवित थे. एक दंपत्ति ने ग़लती से इसकी पत्तियों को सलाद में इस्तेमाल कर लिया. अगले 24 घंटे तक दोनों की स्थिति बेहद ख़राब रही लेकिन दोनों बच गए."
आम मान्यता ये है कि पौधों में ये टॉक्सिन या ज़हर ख़ुद की सुरक्षा के लिए विकसित हुआ है. इसके चलते यह पौधा कीटों और जानवरों से अपना बचाव कर पाता है.

संपर्क ख़तरनाक

ऐसा ही एक पौधा है हॉगवीड (हेरेसलियम मांटेगाज़िएनम). अगर यह इंसानों की त्वचा के संपर्क में आए और फिर सूर्य की रोशनी से रिएक्ट करे तो त्वचा पर जलन उत्पन्न करने लगता है. हालांकि गाजर, अजवाइन और नींबू के पौधों में भी यह गुण होता है और बुरी परिस्थितियों में ये पौधे त्वचा पर छाले कर सकते हैं.
इसी तरह दक्षिणी अमरीका के उत्तरी हिस्से यानी फ्लोरिडा और कैरेबियाई द्वीप में भी उगने वाला पौधा मैनकीनील (हिप्पोमाने मैनकीनीला) को छूना भी ख़तरनाक माना जाता है. इसे भी दुनिया के ख़तरनाक पौधों में एक माना जाता है. इसके आसपास चेतावनी के संकेत वाला बोर्ड भी आपको नज़र आ सकता है.
इस पौधे के नीचे बारिश में खड़ा होना भी ख़तरनाक हो सकता है. इसके पत्तों से टकरा कर आने वाला पानी भी त्वचा को काफी नुकसान पहुंचाता है. इन पौधों को जलाना भी ख़तरनाक हो सकता है. इसके धुंए के संपर्क में आने से आंखों की रोशनी तक जा सकती है और सांस की समस्या भी हो सकती है.

'लिटिल एप्पल ऑफ़ डेथ'

जाहिर है मैनकीनील पौधे का असर तो अच्छा नहीं होता है, लेकिन इसके संपर्क में आने से आपकी मौत नहीं होगी. लेकिन अगर इसके छोटे से फल को किसी ने खा लिया तो मौत का खतरा हो सकता है.
इस फल का स्पेनिश नाम है लिटिल एप्पल ऑफ़ डेथ. इस फल को खाने से उल्टी और दस्त से पूरे शरीर का पानी बाहर निकल जाता है और मौत हो जाती है.
इसके अलावा रिकिनस कोमूनिस की झाड़ी भी बेहद ख़तरनाक होती है. इस पौधे की बीज से ही केस्टर आयल (अरंडी का तेल) निकलता है. इस पौधे के साइंटिफिक लेटिन नाम है राइसिन. इस वजह से अरंडी के पौधे को दुनिया के सबसे ज़हरीला पौधों में से एक माना जाता है.
इसके बीज से तेल निकालने के बाद बचे हिस्से में भी काफ़ी टॉक्सिन मौजूद होते हैं. राइसिन मेटाबॉलिज्म की कोशिकाओं को नष्ट करता है. ये कोशिकाएं जीवन के लिए बेहद आवश्यक होती हैं. इससे उल्टी और दस्त शुरू हो सकती है और एक सप्ताह के अंदर अंग काम करना बंद कर देते हैं और मौत हो सकती है.
लेकिन सवाल यह है कि इतने ख़तरनाक पौधों को हम बगीचे में क्यों उगाते हैं.

अरंडी भी है ज़हरीला

जॉन राबर्टसन बताते हैं, "ज़हरीला और हानिकारक होने में अंतर है. आप ये आसानी से कह सकते हैं कि कौन सा पौधा ज़हरीला है, उसमें कौन सा टॉक्सिन है और उससे क्या हो सकता है? लेकिन अगर आप उसे खाना चाहें तभी वह नुकसानदायक हो सकता है."
अरंडी का बीज शरीर में पचता नहीं है और यदि निगल लिया जाए तो शरीर को ज्यादा नुकसान पहुंचाए बिना ही बाहर निकल जाता है. लेकिन यदि इसके पांच बीज चबा लिए जाएँ और फिर पेट में पहुँच जाए तो ये खुराक घातक साबित होगी. बच्चों के लिए एक ही काफी है. अगर इसे इंजेक्शन के तौर पर दिया जाए तो यह और भी ख़तरनाक होता है.
इसी तरह का ज़हरीला पौधा है अबरीन. इसका बीज भी ख़तरनाक होता है. यह काफी हद तक राइसिन से मिलता जुलता है लेकिन यदि ये शुद्ध हो और पाउडर की तरह खाया जाए, तभी खतरनाक है. हालांकि इसका बाहरी कवच काफी सख़्त होता है लिहाजा इसे पचाना और भी मुश्किल होता है.
वैसे आधुनिक चिकित्सा जगत में ज़हरीले पौधों की वजह से मौत के मामले दुर्लभ ही हैं. लेकिन इन पौधों के बारे में जानने से ख़तरा कम जरूर हो जाता है.

ExoMars’ Organic Sniffing Spectrometer



An artist’s rendering of the ExoMars rover.  European Space Agency
Lewis Dartnell spent the better part of two years researching and field-testing methods to reboot society in his best-selling book The Knowledge. But his day job is arguably even cooler: as an astrobiologist at the University of Leicester, he’s developing ways to look for life on Mars through the European Space Agency’s ExoMars mission. Here, Dartnell provides an update on the frequently delayed, yet scientifically promising mission.
Wired: In The Knowledge, you incorporate ideas and methods from many different branches of science. How does this kind of interconnectedness show up in your own work?
Dartnell: Drawing from lots of different sources is what I do in my own research in astrobiology, and not just knowledge, but the methods and techniques you could use. It’s not just biology, but engineering, and robotics and instruments as well as physics and planetary science, and you’re constantly outside of your comfort zone having to learn new things. It keeps you on your toes, but that’s what I enjoy about astrobiology.
Wired: What is your role with the ExoMars mission?
Dartnell: The exciting thing about ExoMars is that, not only will it for the first time have a drill so it can get properly underground on Mars and find stuff that has been protected from the surface environment, but it’s also going to use experiments like Raman spectroscopy, which is the one that I’m directly involved in at the University of Leicester. The reason Raman’s exciting is that it’s very sensitive and very competent and capable of picking up organic molecules or bio signatures of life, and we want to try this new technique on Mars.
Wired: What are your expectations for ExoMars?

Dartnell: We don’t know, and that’s the point of exploration; you don’t always know what you’re going to try and find. You know what you’re hoping for, and what might be realistic to expect. So what we hope to find on Mars are organic molecules – the basic Lego pieces or building blocks or chemistry kit for life; amino acids and sugars that should exist on Mars but we have yet to discover. Hopefully either NASA’s Curiosity or ESA’s ExoMars will discover those, and maybe beyond that they’ll find not just the building blocks for life but signs of life itself – biosignatures.
Wired: What kinds of biosignatures would be convincing as a sign of past life?
Dartnell: A biosignature is any sign or any evidence of life, and this might be something like a fossilised shape that looks a bit like a cell, it might be things as complex as DNA. It might be more subtle things like isotopic ratios in rocks, which on Earth are used to show early cases of life. Or if we do find things like amino acids, we can tell if they are made by life or through non-living processes like pre-biotic chemistry by their molecular handedness. So there are various quirks or various signs of organic molecules we can look for that would point to biology, rather than geochemical processes.
Wired: What is the likelihood that you will find biosignatures on Mars?
Dartnell: Unfortunately, you basically can’t answer that question. It’s somewhere between 0 and 1, but we don’t know because whenever you’re trying to do something in science you’re trying to do something new that you don’t already know the answer to,
However, for all we know about life on Earth, it seems to have arisen pretty rapidly. It seems like it might be a probable thing to happen, if you’ve got the right kind of environment. So the big question is whether Mars ever have the right kind of environment, and if so, did that basic pre-biotic chemistry ever get far enough down the line to produce cells? And if that happened, what might be the best way of looking for that life and trying to detect these biosignatures? Which biosignatures would still remain after all this time? This is the kind of thing we’re trying to do with ExoMars.

The Oculus Rift Made Me Believe I Could Fly

Birdly is a full-body flight simulator integrating the Oculus Rift.  Joshua Batson/WIRED
Yesterday, I flew over downtown San Francisco. I swooped past the Transamerica Pyramid, taking care not to get speared, and winged it out towards the water. A heavy fog covered the bay, as usual, so I decided to head back into the city. I dove sharply, and the wind started whipping across my face. I slipped under the Bay Bridge, banked hard and promptly slammed into a warehouse. The wind died, and my screen went black.
I was strapped into Birdly, a full-body flight simulator designed to make you forget you’re not a bird. “Press the red buttons and pump your arms to start soaring again,” said Max Rheiner, the Swiss artist responsible for my in-flight experience this week at Swissnex. (Birdly flew here from its birthplace at the Zurich University of the Arts.) The reason that Rheiner could make this simulator now, and not 20 years ago when he first dreamed of helping humans feel like birds, is the arrival of the Oculus Rift. The Rift is the first virtual reality headset with two key features: It’s cheap, and it doesn’t make you want to vomit. Now that there’s a way to provide accurate head-tracking at low enough latency to prevent motion sickness, people who were raised on the promise of virtual reality are starting to experiment.
Climb on!Humans dreamed of flying like a bird for centuries before hot air balloons finally took people into the skies. At first the designers of Birdly took the dream a bit too literally and used a physics engine to model airflow around virtual wings. But it turns out to be hard for humans to fly like an actual bird, learning to flap their wings at the right angle and catch thermals to spiral up. To simulate the effortlessness of dream flight, Rheiner made the interface more metaphorical and intuitive. By twisting your arm you control the pitch of the wing: Tip up to soar higher, and tip down to dive. Catch the air with one hand to bank. To climb faster, you can vigorously pump both wings. Pistons provide realistic resistance, and a fan is calibrated to make the windspeed match your virtual velocity.
Climb on! Joshua Batson/WIRED
It’s admittedly a bit awkward to climb onto Birdly. You bend over a padded frame, strap on a tight headset and headphones, then hook your hands into wooden wings. But then the screen flips on and you find yourself floating above the city, watching your bird-shadow drifting across the rooftops. If you crane your neck, you can see your brown feathers ruffling in the breeze. After a few seconds, flying feels natural.
The individual components of the system are still a bit rough, but together they provide an amazing experience. The screen on the Rift was more pixellated than my smartphone, and I had to move my head slowly to keep the landscape in sync. If this were only a visual tour of the San Francisco skyline, I might have gotten a bit nauseated. But just like the driver of a car almost never feels nauseated even when the passengers in the backseat are clutching their stomachs, I felt comfortable because of the tactile control and physical feedback. I feel like Birdly managed to just get past some threshold of pleasurability and plausibility, so that I wanted to keep flying all night. It also made me impatient to race around faster, diving and swooping and barrel rolling. I wanted to fly over the rest of California, and to see it all with perfect resolution.
Given that Birdly was made by a team of just three people working part-time since receiving a Rift development kit in November, I expect that progress will be swift. For example, the experience will soon include smells. Rheiner, working with a Dutch fragrance designer, built a rig to emit little pumps of scented alcohol as you fly. But a realistic cityscape has to include hot asphalt and car exhaust, and it’s tricky to deliver a whiff of those that won’t knock you out of the sky.
While Rheiner’s team was aiming for art, there might also be a future in travel and fitness. Imagine spending an afternoon flying through the Grand Canyon—a beautiful trip, and if you need to flap your wings the whole time to stay aloft, a serious work out. Before a walk to your basement can replace a helicopter ride in Hawaii, though, a compendium of detailed 3-D maps would be required. Promisingly, Google Earth sent 20 people to visit Birdly last week.
An interface like Birdly’s could some day be used to fly a real drone in realtime, says Rheiner. You could fly wherever you want and see what’s happening there right now, no mapping necessary. You could take a trip to check out the forest fires raging in Northern California, or circle a friend’s outdoor BBQ like a (creepy) vulture. Using your body to control a drone would also obviously be more fun than using a joystick, and might be safer too. The more you identify with the drone, the more you feel its body as your own, the better your reflexes could be. If a plane zooms into your peripheral vision, you’ll flap your wings instead of dropping the controller.
Today there is only one Birdly prototype. If you want to ride it, you have to catch the machine next week in San Francisco (at Swissnex or the Exploratorium) or at the SIGGRAPH conference in Vancouver from August 10-14. But don’t worry too much if you miss it. Birdly is less a definitive experience than an argument that, at last, we have all the pieces necessary to make an engaging full-body simulation. So if you would rather swim like a dolphin or squirm like a snake than fly like a bird, just wait a bit. The consumer version of the Rift should be out in about a year. Meanwhile, In companies and universities and studios around the world, designers are starting to make your dream a (virtual) reality.
content is picked from wired.com

पेपर की तरह मोड़ सकेंगे टीवी को?



इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी एलजी ने पेपर जैसे पतले दो नए टीवी स्क्रीन लॉन्च किए हैं जिनमें से एक इतना लचीला है कि उसे तीन सेंटीमीटर की गोलाई में मोड़ा जा सकता है.
 कंपनी का कहना है कि इसके ज़रिए अब टीवी को नई तरह से इस्तेमाल किया जा सकेगा.
मुड़ने वाली स्क्रीन
इस नए टीवी स्क्रीन का रेज़ोल्यूशन 1,200x810 है जिसकी वजह से इसे मोड़ने के बाद भी तस्वीरें बिगड़ती नहीं.
कंपनी को विश्वास है कि 2017 तक वो इसके ज़रिए 60 इंच का मुड़ने वाला टीवी बनाने में कामयाब होंगे.
पारदर्शी स्क्रीन
स्टफ़ टीवी के संपादक स्टीफ़न ग्रेव्स के मुताबिक, "मुड़ने वाली स्क्रीन एक बेहतरीन तकनीक है जो नए रास्ते खोलती है. ये परंपरागत स्क्रीन से ज्यादा टिकाऊ होगी. इसका मतलब है कि हम हवाई जहाज़ जैसी जगहों पर बड़ी और बेहतर स्क्रीन की उम्मीद कर सकते हैं."
कंपनी ने इस साल की शुरूआत में अपने पहले 'लचीले टीवी' की घोषणा एक इलेक्ट्रॉनिक्स ट्रेड शो में की थी.

दवा प्रतिरोधी मलेरिया का ख़तरा


मलेरिया
दक्षिण पूर्वी एशिया में दवा-प्रतिरोधी मलेरिया का तेज़ी से प्रसार हो रहा है और अब यह कंबोडिया-थाईलैंड सीमा तक पहुंच गया है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि दवा-प्रतिरोधी मलेरिया को रोकने के लिए "कड़े कदम" उठाने की ज़रूरत है.
वैज्ञानिकों ने  'न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन' में बताया है कि मलेरिया के बढ़ते मामलों से मलेरिया नियंत्रण के प्रयासों को गहरा झटका लगा है.

प्रतिरोधक क्षमता

एक अध्ययन में एशिया और अफ़्रीका के 10 देशों के 1000 मलेरिया मरीजों के खून के नमूनों का परीक्षण किया गया था.
इसमें पाया गया कि पश्चिमी और उत्तरी कम्बोडिया, थाईलैंड, वियतनाम और पूर्वी म्यांमार में परजीवियों ने मलेरिया के सबसे प्रभावकारी दवा अर्टीमिज़ीनिन्स के ख़िलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है.
हालांकि अफ्रीका के तीन देशों केन्या, नाइजीरिया और कांगो में प्रतिरोधी मलेरिया के साक्ष्य नहीं मिले.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफ़ोर्ड के प्रोफेसर निकोलस व्हाईट ने कहा, "प्रतिरोधक मलेरिया का असर दक्षिण पूर्वी एशिया के अधिकांश हिस्से में है. हम जितना उम्मीद करते थे, यह उससे भी बदतर है. इस दिशा में कुछ करना है तो हमें जल्दी कार्रवाई करनी होगी.''
उन्होंने कहा, ''आगे इसके प्रसार को रोकना बहुत हद तक संभव है, लेकिन मलेरिया नियंत्रण के परंपरागत तरीके पर्याप्त नहीं होंगे. हमें और अधिक कड़े कदम उठाने की ज़रूरत है और बिना देरी किए इसे दुनिया भर में सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में तरजीह देने की ज़रूरत है."

क्या हमें भविष्य के रोबोट से डरना चाहिए?

क्या हमें भविष्य के रोबोट से डरना चाहिए?

रोबोट
तकनीकी विषयों की दुनिया की सबसे पुरानी पत्रिका एमआईटी टेक्नॉलॉजी रिव्यू ने 2011 में विज्ञान की काल्पनिक कहानियों पर आधारित एक अंक निकाला था.
पत्रिका के मुताबिक़ इस अंक का उद्देश्य नई तकनीकों की पहचान करना और उन तकनीकों का हमारे जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की पड़ताल करना था.
इससे पहले भी विज्ञान गल्प या सांइस फ़िक्शन की कहानियों में इस तरह की उल्लेखनीय काम की परंपरा रही है.

1937 में एमआईटी ग्रेजुएट ने जॉन कैंपबेल ने एसटॉउंडींग स्टोरीज़ मैगज़ीन का संपादन किया था और उसका नाम बदलकर एसटॉउंडींग साइंस फ़िक्शन कर दिया था.
इसमें विश्वसनीय लगने वाले पात्रों और विज्ञान की कल्पनाओं पर ज़ोर दिया गया था.
ऐसी ही चौंका देने वाली एक कहानी हिरोशिमा बम विस्फोट की घटना से एक साल पहले की है जिसमें परमाणु बम बनाने की बात का उल्लेख हैं.

भविष्य का सामाजिक संवाद

हिरोशिमा बम विस्फोट
लेकिन भविष्य का आकलन करना मुश्किल है और अक्सर यह ग़लत साबित होता है. इसका यह मतलब नहीं कि यह एक बेकार काम है.
साइंस फ़िक्शन लेखक रॉबर्ट सेवयर 2003 में साइंस फ़िक्शन के सबसे बड़े पुरस्कार ह्यूगो अवार्ड के विजेता है.
उनका कहना है कि उनका काम भविष्य के सामाजिक संवादों की पड़ताल करना है.
राबर्ट सेवयर कुछ ऐसी बातों को लेकर बहुत आशान्वित हो जो लोगों के लिए चिंता का विषय है मसलन भविष्य की ऊर्जा संबंधी ज़रूरतें भी इनमें से एक हैं. वह अपने विज्ञान गल्प के लेखनीय दृष्टि से ऊर्जा के सतत स्रोतों का भविष्य में इतना विस्तार होते हुए देखते हैं कि ऊर्जा संसाधनों की क़ीमत लगभग शून्य हो जाएगी.
रोबोट
इसबीच अमरीका के साइंस फ़िक्शन लेखक रे कुर्जवेल 2050 की स्थिति का आकलन करते हैं जब कृत्रिम बुद्धिमता मानवीय बुद्धिमता की जगह ले लेगा.
सेवयर कहते हैं, "जब हमारे पास हमारी बुद्धिमता के बराबर और दोगुनी बुद्धिमता का मशीन होगा तो कोई कारण नहीं है कि मशीन और इंसान के बीच का यह रिश्ता सहक्रियाशिलता के बदले विरोधाभासी हो जाए."
वह आगे कहते हैं कि लोगों के लिए डर का सबसे बड़ा कारण है कि भविष्य में उसका सामना एक ऐसे बुद्धिमान रोबोट से होने वाला है जो विलक्षण बुद्धिमता वाला होगा और वह इंसान नहीं होगा लेकिन इंसानी आकांक्षाओं वाला होगा.

पेपर स्प्रे बुलेट ड्रोन


पेपर स्प्रे बुलेट ड्रोन
दक्षिण अफ़्रीका की कंपनी ने एक ऐसा ड्रोन तैयार किया है जो पेपर स्प्रे की गोलियां दाग़ता है.
दक्षिण अफ़्रीकी मूल की कंपनी डेजर्ट वुल्फ़ ने बीबीसी को बताया कि लंदन के ट्रेड शो में प्रदर्शन के बाद एक खनन कंपनी ने इसके 25 यूनिट की ख़रीद के लिए ऑर्डर दिया है.
कंपनी ने इस उपकरण को 'दंगा नियंत्रक हेलीकॉप्टर' के रूप में बाज़ार में उतारा जो 'सुरक्षा कर्मचारियों की जान को ख़तरे में डाले बिना भीड़ से निपटने' में माहिर है.
लेकिन अंतरराष्ट्रीय ट्रेड यूनियन संघ, आईटीयूसी इस उपकरण से क़्ततई सहमत नहीं है.
अंतरराष्ट्रीय ट्रेड यूनियन संघ के प्रवक्ता टिम नूनान कहते हैं, "यह मुश्किल में डालने वाला और विकास का दुश्मन है. हम सब जानते हैं कि वैध विरोध और प्रदर्शनों में शामिल लोगों या कार्यकर्ताओं पर इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल करना ठीक नहीं है. हम इसे रोकने के लिए तुरंत क़दम उठाएंगे."

'चकाचौंध करने वाला लेजर'

पेपर स्प्रे बुलेट ड्रोन, डेजर्ट वूल्फ वेबसाइट
डेजर्ट वूल्फ पहले भी उद्योंगों को ड्रोन प्रोडक्ट बेचता रहा है.
डेजर्ट वूल्फ़ की वेबसाइट कहती है कि इसके 'स्कुंक ऑक्टाकोप्टर ड्रोन' में उच्च क्षमता वाले चार पेंटबॉल बैरल लगे हुए हैं जिसमें से प्रत्येक में प्रति सेकेंड 20 गोलियों को चलाने की क्षमता है.
कंपनी का कहना है कि इस ड्रोन को  पेपर स्प्रे के अतिरिक्त डाई-मार्कर बॉल्स और सॉलिड प्लास्टिक बॉल्स से लैस किया जा सकता है.
इस उपकरण में एक बार में ब्लाइंडिंग लेजर और भीड़ को चेतावनी देने वाले स्पीकर सहित 4,000 गोलियां को रखने की क्षमता है.
डेजर्ट वूल्फ़ के प्रबंधन निदेशक हेन्नी कीसर ने bbc को बताया, "हमें तुरंत 25 यूनिटों के ऑर्डर मिल गए."
वे आगे कहते हैं "हम ग्राहकों की पहचान जाहिर नहीं कर सकते हैं, लेकिन ये बताने की इजाजत है कि यह एक अंतरराष्ट्रीय खनन कंपनी है."

सुरक्षित समाधान

कीसर का कहना है, "हमने स्कुंक को सुरक्षा जोखिमों से बचने के लिए विकसित किया है."
पेपर स्प्रे बुलेट ड्रोन
डेजर्ट वूल्फ ने इस ड्रोन को इसी हफ्ते लंदन में प्रदर्शत किया है.
"हम एक और लोनमिन मरीकाना बर्दाश्त नहीं कर सकते. एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करना जो घातक नहीं हो, मुझे लगता है ज़्यादा सुरक्षित होगा."
लोनमिन मरीकाना वो संदर्भ है, जिसमें 2012 में दक्षिण अफ़्रीका के एक प्लैटिनम खदान पर हुए वेतन विवाद में हिंसक विरोध प्रदर्शन हुआ जिसमें 44 मौतें हुई थीं.
लेकिन अभियान समूह 'रोबोट आर्म्स' की अंतरराष्ट्रीय समिति के अध्यक्ष नुएल शर्की ने चिंता जाहिर की है क इस उपकरण से विरोध को दबाने की प्रवृति और तानाशाही के बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है.
उनका कहना है, "हवा से प्लास्टिक बॉल या गोली दागने से लोग पंगु हो जाते हैं, मारे भी जा सकते हैं."
उन्होंने बताया, "प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर पेपर स्प्रे करना एक तरह की यातना है जिसकी अनुमति नहीं दी जानी चाहिए."
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सौर आंधी की वज़ह से कड़कती है बिजली



बिजली
एक अध्ययन के मुताबिक़ सूरज पर होने वाली गतिविधियों की वज़ह से धरती पर बिजली गिरती है.
वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया है कि तेज़ गति के सौर कणों का झोंका जब वायुमंडल में प्रवेश करता है तो बिजली बोल्ट की संख्या बढ़ जाती है.
यह शोध इनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ है.
अब जबकि सूरज पर होने वाली गतिविधियों पर सैटेलाइट के द्वारा बारीकी से नज़र रखी जाती है इसलिए यह संभव है कि सौर कणों की ख़तरनाक आंधी के धरती के वायुमंडल से टकराए जाने का पूर्वानुमान लगाया जा सके.

प्रभाव

यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रमुख शोधकर्ता डॉ क्रिस स्कॉट ने कहा, " बिजली काफ़ी ख़तरनाक होती है. हर साल 24 हज़ार लोग बिजली के आघात से मारे जाते हैं. इसलिए सौर कणों की आंधी की कोई भी पूर्व चेतावनी काफ़ी उपयोगी साबित होगी. "
सौर आंधी
सौर कणों की आंधी के धरती के वातावरण में प्रवेश करने के साथ ही उत्तरी ध्रुव पर प्रकाश फैल सकता है, लेकिन शोध बताता है कि कैसे ये मौसम को भी प्रभावित कर सकता है.
डॉ स्कॉट ने कहा, " सौर आंधी लगातार एक जैसी नहीं रहती, यह तेज़ और धीमी होती रहती है. चूंकि सूरज घूमता रहता है इसलिए ये धाराएँ एक दूसरे का पीछा करती रहती है इसके चलते यदि तेज़ सौर आंधी का पीछे धीमी सौर आंधी है तो इससे सौर कणों की सघनता बढ़ जाती है. "
वैज्ञानिकों ने पाया कि जब सौर कणों की आंधी की गति और प्रबलता बढ़ती है तो बिजली गिरने की दर भी बढ़ जाती है.
शोधकर्ता दल ने कहा, " सौर कणों के धरती के वातावरण से टकराने के बाद एक महीने तक मौसम अशांत रह सकता है. "

प्रक्रिया

शोधकर्ताओं ने उत्तरी यूरोप के आकड़ों का इस्तेमाल करके यह पाया कि 400 दिनों में 321 बिजली गिरने की घटना की तुलना में तेज़ गति वाले सौर आंधी के बाद 400 दिनों में औसतन 422 बिजली गिरने की घटना हुई.
उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश
डॉ स्कॉट ने कहा, " यह चौंकाने वाला परिणाम था क्योंकि पहले यह सोचा गया था कि सौर आंधी में बढ़ोत्तरी का उल्टा असर होगा. "
शोधकर्ता दल इसकी प्रक्रिया को लेकर वास्तव में आश्वस्त नहीं है लेकिन उन्होंने कहा कि सौर कण बादलों में प्रवेश करके विद्युत ऊर्जा को बिजली में तब्दील कर देता है.
हालांकि इसकी प्रक्रिया से संबंधी सवालों के जवाब अभी भी अधूरे हैं. लेकिन सौर कणों के पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने से संबंधी बहुत सी जानकारियां मौजूद हैं जो सौर आंधी की भविष्यवाणी करने में मदद कर सकती हैं
अध्ययन के आंकड़े यूरोप में इकट्ठे किए गए है लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका प्रभाव विश्वव्यापी होगा.

सबसे ख़तरनाक डायनोसोर 'पिनोकियो'?


नया टायरेनोसोरस
लंबी नाक वाले एक नए टायरेनोसोरस डायनोसोर का पता चला है. शोधकर्ताओं ने इसे 'पिनोकियो रेक्स' नाम दिया है.
नौ मीटर लंबा, ख़ास तरह की नुकीली नाक वाला यह उग्र मांसभक्षी 'टायरेनोसोरस रेक्स' ही प्रजाति का बताया जा रहा है.
'पिनोकियो रेक्स' का कंकाल चीन में सड़क निर्माण के दौरान की गई खुदाई में पाया गया है. इसकी पहचान ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने की है.
6.6 करोड़ साल पुराने इस हिंसक जानवर को आधिकारिक रूप से 'कियांझाऊसोरस साइनेंसिस' रखा गया है.

ऑनलाइन साइंस जर्नल 'नेचर कम्युनिकेशन' में इसका ज़िक्र किया गया है. 'पिनोकियो' दूसरे टायरेनोरस से अलग दिखता है.

पिनोकियो की लंबी नाक

एडिनबरा विश्वविद्यालय के डॉक्टर स्टीव ब्रूसेट ने बताया, "इसके दांत तो टी. रेक्स से मिलते जुलते हैं, लेकिन इसकी नाक ज्यादा लंबी और पतली है, जिसके अगले सिरे पर कांटों की कतार दिखती है."
नए टायरेनोसोरस का कंकाल
स्टीव ब्रुसेट ने आगे कहा, "हो सकता है कि ये आपको कुछ हास्यास्पद दिखाई दे, लेकिन ये किसी भी अन्य टायरेनोसोरस की तरह ही खूंखार होता, बल्कि संभव है कि उनसे ज़्यादा फुर्तीला और छिप कर वार करने वाला हो."
उन्होंने कहा, "हमें इसे पुकारने के लिए एक नाम चाहिए था. इसकी लंबी नाक देखकर हमें पिनोकियो याद आ गया, इसलिए हमने इसे यही नाम दिया है."
शोधकर्ताओं का अब मानना है कि एशिया में डायनोसोर के क्रिटेशियस युग के अंतिम दिनों में, जो कि डायनोसोर के भी अंतिम दिन थे, शिकार करने वाले कई अलग-अलग तरह के टायरेनोसोरस होते थे.
तेरह मीटर तक लंबे विशालकाय टर्बोसोरस के टी. रेक्स जितने गहरे और शक्तिशाली जबड़े थे जो बड़े-बड़े शाकाहारियों की हड्डी चबा जाने की ताकत रखते थे.
जबकि नौ मीटर लंबे कियांझाऊसोरस के बारीक दांतों को देखकर ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि ये पंख वाले डायनोसोर और छिपकली जैसे छोटे जीव-जंतुओं को अपना शिकार बनाता था.

टायरोनोसोर की नई प्रजाति

पिनोकियो की नाक का आकार अपनी तरह के जानवरों की अपेक्षा 35 फीसदी बड़ा था, लेकिन उसका चेहरा आखिर इतना लंबा क्यों है?
खुदाई स्थल पर दो वैज्ञानिक
डॉक्टर ब्रुसेट ने बीबीसी को बताया, "हक़ीक़त ये है कि हम इसका कारण अब तक पता नहीं लगा पाए हैं, लेकिन ज़रूर यह किसी खास गतिविधि के कारण होगा."
वो बताते हैं, "यह नया डायनोसोर हल्का और अपेक्षाकृत कमजोर मांसपेशियों वाला था. संभवतः यह ज़्यादा तेज़ी से अपने शिकार पर झपटता होगा. टायरेनोसोरस टी. रेक्स सभी डायनोसोर में सबसे ख़तरनाक और घातक है."
पिनोकियो के सामने आने से विचित्र टायरनोसोरस के एक के बाद एक मिल रहे जीवाश्मों पर चल रही बहसों पर विराम लगता दिखता है.
टायरेनोसोरस उद्भव का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर ब्रुसेट ने बताया, ''कियांझाऊसोरस का नमूना एक वयस्क का है और इसे खुदाई के समय बहुत संभाल कर निर्माण करने वाले मज़दूरों ने निकाला.''
इसे दक्षिणी चीन में गंझाऊ के नज़दीक सड़क निर्माण के दौरान खुदाई में पाया गया था. जहां तक पिनोकियो की नाक का सवाल है, वैज्ञानिक उम्मीद कर रहे हैं कि इसके जबड़े के जैव रासायनिक अध्ययन से इसका जवाब मिल सकेगा.

हाल के वर्षों में मंगोलिया में खुदाई के दौरान दो असाधारण कंकाल मिले हैं. इन्हें टायरेनोसोरस प्रजाति की बिलकुल नई शाखा से संबंधित माना जा रहा है.

सूरज के पास जाने की तैयारी


ब्रिटिश कंपनी बनाएगी सौर कक्षा में भेजने वाला उपग्रह
ब्रिटेन उस अंतरिक्ष यान को बनाने की प्रक्रिया का नेतृत्व करेगा जो सूर्य की कक्षा में उसके चारों ओर चक्कर लगाएगा.
ये अंतरिक्ष यान बुध ग्रह की कक्षा के भीतरी ओर से तस्वीरें लेगा, जिससे सूर्य की भीतरी गतिविधियों के स्रोत का पता चल सकेगा.
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ने ब्रिटेन की कंपनी एस्ट्रियम यूके से इस उपग्रह को बनाने का समझौता किया है जिसे वर्ष 2017 में प्रक्षेपित करने की योजना है.
ये सौदा तीस करोड़ यूरो यानी लगभग पच्चीस करोड़ पौंड में हुआ है.
पेरिस स्थित इस एजेंसी का ब्रिटेन की किसी कंपनी से ये अब तक के सबसे बड़े सौदों में से एक है.
इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो ये समझौता लगभग ऐसे समय पर हुआ है जब अंतरिक्ष के क्षेत्र में ब्रिटेन की गतिविधियों के पचास साल पूरे हुए हैं.
26 अप्रैल 1962 को एरियल-1 उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ ही ब्रिटेन अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने वाले देशों में शामिल हुआ.
सूर्य की कक्षा में प्रक्षेपित होने के बाद ये उपग्रह सूर्य परिवार के काफी नजदीक तक पहुंच जाएगा.
ये सूर्य से करीब चार करोड़ 20 लाख किलोमीटर की दूरी के दायरे में निकटता बनाएगा ताकि वैज्ञानिक सूर्य से निकलने वाली ऊर्जा का अध्ययन कर सकें.

समस्या

एस्ट्रियम यूके में विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. राल्फ कॉर्डे का कहना है कि इस अभियान में ऊष्मा या गर्मी एक बड़ी समस्या है.
"हम इतने ज्यादा तापमान को सहने वाली एक शील्ड तैयार करेंगे जो इस तापमान को कम कर सके"
डॉ. राल्फ कॉर्डे, वैज्ञानिक
उन्होंने कहा, ''इसे पर्याप्त सुरक्षित बनाने की जरूरत है, क्योंकि इस अंतरिक्ष यान को पांच सौ डिग्री तापमान सहन करना होगा, जो पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में विनाशकारी हो सकता है.''
उनका कहना था, ''हम लोग इतने ज्यादा तापमान को सहने वाली एक शील्ड तैयार करेंगे जो इस तापमान को कम कर सके.''
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस मिशन से ये जानकारी भी मिल सकेगी कि कैसे सूर्य के चारों ओर हीलियोस्फियर का निर्माण होता है जिसकी वजह से सूर्य के चारों ओर का तापमान इतना ज्यादा होता है.
ये मिशन यूरोपीय स्पेस एजेंसी और अमरीकी स्पेस एजेंसी अर्थात् नासा का संयुक्त उपक्रम है. नासा इस मिशन को रॉकेट जैसे उपकरण प्रदान करेगा.
source bbc hindi

आधुनिक शेरों की उत्पत्ति की कहानी



शेर
आधुनिक शेरों की उत्पत्ति और इतिहास का वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया है.
जीवित शेरों और म्यूज़ियम में मौजूद नमूनों के जेनेटिक विश्लेषण से पता चला है कि आधुनिक शेरों के सबसे क़रीबी पूर्वज 1,24,000 वर्ष पूर्व तक जीवित थे.
आधुनिक शेरों का विकास दो समूहों में हुआ. एक समूह पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में चला गया और दूसरा समूह पश्चिमी अफ्रीका और भारत.
दूसरे समूह के शेर अब लुप्तप्राय हैं. इसका मतलब हुआ कि आधुनिक शेरों की आधी जैव विविधता खत्म होने की कग़ार पर पहुंच चुकी है.
इस अध्ययन के नतीजों को  बीएमसी इवोल्यूशनरी बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित किया गया है.
शेरों के इतिहास को खोजना बेहद कठिन कार्य रहा है. हाल का समय इस प्रजाति के लिए काफी मुश्किल भरा रहा है क्योंकि इंसानी गतिविधियों के चलते उनके अस्तित्व पर संकट छा गया है.
जीवाश्म रिकॉर्ड में निरंतरता का अभाव और शेरों के बिखरे आवास वाले इलाके इतिहास की कड़ी को जोड़ने में सबसे बड़ी बाधा रहे हैं.

उद्भव

इसलिए वैज्ञानिकों के अंतरराष्ट्रीय समूह ने दुनियाभर के म्यूज़ियमों और संग्रह केंद्रों में शेरों की प्राचीन डीएनए को खोजना शुरू किया.
इंग्लैंड के डरहम विश्वविद्यालय से जुड़े डॉ. रॉस बर्नेट के नेतृत्व में इस टीम ने विभिन्न प्रजातियों की डीएनए का अध्ययन किया.
टीम ने विलुप्त हो चुके उत्तरी अफ़्रीका के बारबेरी शेर से लेकर विलुप्त इरानी और मध्य व पश्चिमी अफ़्रीकी शेरों के नमूनों का अध्ययन किया.
शोधकर्ताओं ने एशिया और अफ़्रीका के अन्य हिस्सों में जीवित शेरों के डीएनए से प्राचीन डीएनए का मिलान किया और पता लगाने की कोशिश की कि विभिन्न प्रजातियों का विकास कैसे हुआ.
अध्ययन में खुलासा हुआ कि इस समय शेरों की जो एकमात्र प्रजाति पैंथेरा लियो मौजूद है, वो पहली बार पूर्वी-दक्षिणी अफ़्रीका में दिखी थी.
लगभग 1,24,000 वर्ष पूर्व विभिन्न प्रजातियों का विकास शुरू हो गया था.

अनुवांशिक अंतर

यह वही समय है जब उष्णकटिबंधीय जंगलों का पूरे ध्रुवीय अफ़्रीका में प्रसार हुआ और सहारा क्षेत्र सवाना में बदल गया.
महाद्वीप के दक्षिण और पूर्व रहने वाले शेर अलग हो गए और उनका विकास पश्चिमी व उत्तरी हिस्से में रहने वाले शेरों से अलग होना शुरू हुआ.
इससे दोनों शेरों के बीच आया अनुवांशिक अंतर आज भी मौजूद है.
"पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेर सोमालिया या बोत्सवाना की अपेक्षा भारतीय शेरों की प्रजाति से ज्यादा मिलते जुलते हैं."
डॉ. रॉस बर्नेट, शोधकर्ता
51,000 वर्ष पूर्व महाद्वीप सूख गया और सहारा का प्रसार हुआ. इससे उत्तर और दक्षिण का इलाका अलग हो गया.
इसी समय पश्चिम में रहने वाले शेरों की पहुंच मध्य अफ़्रीका तक हो गई, जो वहां रहने के ज्यादा अनुकूल था.
तबसे नील समेत अफ़्रीका की बड़ी नदियां इन शेरों को अलग करने में बड़ी बाधा बनी रहीं.
प्राचीन डीएन के अध्ययन से यह भी खुलासा हुआ कि आधुनिक शेरों की प्रजाति ने 21,000 वर्ष पहले अफ़्रीका से बाहर की यात्रा शुरू की और अंततः भारत पहुंचे.
इसके बहुत बाद, लगभग 5,000 वर्ष पूर्व शेरों का एक और समूह महाद्वीप से बाहर गया और मध्यपूर्व में स्थित ईरान में पहुंचा.
ये शेर अब लुप्त हो चुके हैं.

बारबेरी प्रजाति

भारत के काठियावाड़ में 400 से भी कम एशियाई शेर (पी. लियो पर्सिका) बचे हैं. इस प्रजाति को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर द्वारा लुप्तप्राय घोषित किया जा चुका है.
डॉ. बर्नेट ने बताया, ''पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेर सोमालिया या बोत्सवाना की अपेक्षा शेरों की भारतीय प्रजाति से ज्यादा मिलते जुलते हैं.''
दोनों के बीच भारी भौगोलिक दूरी के बावजूद इनमें ईरानी शेरों और उत्तरी अफ़्रीका के बारबेरी शेरों से ज्यादा समानता दिखती है.
डॉ. बर्नेट ने बताया, ''यह जानकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि लुप्त बारबेरी शेरों और उत्तरी अफ़्रीका व भारतीय शेरों के बीच बहुत नज़दीकी रिश्ता है.''
अपने आकार और गुम इतिहास के चलेत विशाल मांसभक्षी जानवरों में बारबेरी शेर ज्यादा रहस्यमय हैं.
कभी उत्तरी अफ़्रीका में बहुतायत में पाए जाने वाले बारबेरी शेर शारीरिक रूप से एशिया और अफ़्रीका में अन्य जगहों पर पाए जाने वाले शेरों से विशिष्ट थे.
अभी तक ये निश्चित नहीं है कि कोई बारबेरी शेर ज़िंदा है या नहीं और संरक्षणवादी इस उप-प्रजाति को फिर से जीवित करने की कोशिश में हैं.

संरक्षण

साक्ष्य बताते हैं कि कुछ शेर मोरक्को के शाही परिवार के संग्रह के हिस्से के रूप में बचे हो सकते हैं.
हालांकि पूर्व में हुए शोध और ताज़ा अध्ययन से पता चलता है कि वो असली बारबेरी शेर नहीं थे.

ऐसे सुलझी गुत्थी

  • ब्रिटेन के टॉवर ऑफ लंदन में कभी कैद रखे गए दो बारबेरी शेरों की हड्डियों से गुत्थी सुलझी.
  • टॉवर में इन शेरों का संरक्षित कंकाल खोजा गया.
  • लुप्त हो चुके गुफ़ा शेरों का यह सबसे आधुनिक प्रमाण है.
  • ये 14वीं और 15वीं शताब्दी तक जीवित थे.
  • इस कंकाल के डीएन ने ही वैज्ञानिकों को बारबेरी और भारतीय शेर के बीच करीबी संबंध को खोजने में मदद की.
यदि ऐसा है और बारबेरी शेर खत्म हो चुके हैं तो नए अध्ययन का नजीजा बताता है कि अनुवांशिक रूप से ज्यादा करीबी रहे भारतीय शेरों को उनके प्राकृतिक आवास में पुनः भेजा जा सकता है.
डॉ. बर्नेट के अनुसार, भविष्य में उत्तरी अफ़्रीका में शेरों को ले जाना एक जटिल प्रक्रिया होगी. ऐसे में उनका प्रजनन एक तरीका हो सकता है.
अफ़्रीका के शेरों की लगभग एक तिहाई संख्या पिछले 20 वर्षों में ग़ायब हुई है.
शोधकर्ता पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेरों को लेकर सबसे ज़्यादा चिंता जताते हैं, जो कि लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं. इन दोनों इलाकों में क्रमशः 400 से 800 और 900 शेर बचे हुए हैं.
इन प्रजातियों के कुछ शेरों को चिड़ियाघरों में संरक्षित कर रखा गया है.

अब सिंथेटिक क्रोमोसोम तैयार


ख़मीर क्रोमोसोम
जैविक इंजीनियरिंग में एक बड़ी छलांग लगाते हुए वैज्ञानिकों ने ख़मीर का पहला सिंथेटिक गुणसूत्र (क्रोमोसोम) तैयार किया है.
इससे पहले अब तक सिंथेटिक डीएनए बैक्टीरिया जैसे सरल जीवों के लिए बनाया गया था.
ख़मीर की जीवन रचना ऐसी है जिसकी कोशिकाओं का एक केंद्र होता है, जो पौधों और जानवरों से मिलता जुलता है. इसमें 2,000 जीन्स होते हैं.
इसलिए ख़मीर के पहले 16 गुणसूत्रों को तैयार करना उभरते हुए सिंथेटिक बायोलॉजी विज्ञान की 'बड़ी उपलब्धि' मानी जा रही है.
शोध में ख़मीर में मौजूद मूल गुणसूत्रों को सिंथेटिक गुणसूत्रों से बदल दिया गया. वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया गया गुणसूत्र ख़मीर में सफलतापूर्वक काम करने लगा.
इसके बाद वैज्ञानिकों ने ख़मीर के पुनरुत्पादन का भी निरीक्षण किया ताकि इसे व्यवहारिकता की कसौटी पर कसा जा सके.

'अप्रत्यक्ष खतरे'

शोध के लिए ख़मीर का प्रयोग बहुत उपयोगी माना जाता है. बेकिंग और मद्यकरण में ख़मीर का बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता है और भविष्य में इसके औद्योगिक इस्तेमाल की भी बहुत संभावनाएं हैं.
कैलिफ़ोर्निया में एक कंपनी पहले भी सिंथेटिक बायोलॉजी की मदद से ख़मीर की ऐसी किस्म तैयार कर चुकी है जो मलेरिया की दवा का एक तत्व, आर्टेमिसिनिन पैदा कर सकती है.
ख़मीर क्रोमोसोम
ख़मीर में गुणसूत्र-lll का संश्लेषण एक अंतर्राष्ट्रीय टीम द्वारा किया गया. बाद में इसके परिणामों को साइंस जर्नल में प्रकाशित भी किया गया. (ख़मीर के गुणसूत्रों का नाम सामान्यतः रोमन अंकों पर रखा जाता है.)
शोध में वैज्ञानिकों की टीम की अगुवाई करने वाले, लैनगोन मेडिकल सेंटर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के डॉक्टर जेफ़ बोएके का कहना है, "इससे सिंथेटिक बायोलॉजी की सुई सिद्धांत से हक़ीक़त की ओर बढ़ी है."
बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि शोध का परिणाम सच में रोमांचक है. उन्होंने कहा, "जिस हद तक हमने अनुक्रम बदले उसके बाद भी अंत में हमने स्वस्थ और खुश ख़मीर पाया."
नए गुणसूत्र को सिन-lll नाम दिया गया है. इसे बनाने में 273,871 डीएनए जोड़ों का इस्तेमाल किया गया है, जो ख़मीर के शरीर के मूल गुणसूत्र में मौजूद 316,667 डीएनए से थोड़ा कम है.
डॉक्टर बोएके ने बताया, "हमने उसके शरीर में 50 हज़ार से अधिक डीएनए कोड को बदल दिया था. इसके बावज़ूद ख़मीर न केवल साहसी निकला बल्कि उसने नए तरह के काम करने भी शुरू कर दिए. नए काम करने की तरक़ीब हमने उसके गुणसूत्र में मशीन की मदद से सिखाया."
ख़मीर के अंदर आए नए बदलाव का कारण रसायनिक परिवर्तन है, जिससे वैज्ञानिक उसके गुणसूत्रों में हज़ारों तरह की भिन्नता ला सकते हैं, जो जेनिटिक कोड को बदलने में मददगार होगा.
उम्मीद है कि ख़मीर के सिंथेटिक गुणसूत्रों की मदद से इसका प्रयोग उपयोगी टीकों और जीव ईंधन को बनाने में किया जा सकेगा.
आनुवांशिक संशोधन में एक जीव से दूसरे जीव के अंदर जीन को स्थानान्तरित किया जाता है, वहीं सिंथेटिक जीव विज्ञान में नए जीन का निर्माण किया जाता है.
मगर विज्ञान जगत से बाहर कुछ लोगों का मानना है कि इस शोध से वैज्ञानिक भगवान बनने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही वह इसके दूरगामी दुष्प्रभावों को नजरअंदाज़ कर रहे हैं.
ल्योड्स इंश्योरेंस बाज़ार ने 2009 में अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि नई तकनीक के खतरे अप्रत्यत्क्ष होते हैं.

समुद्र में 20 फीट नीचे रात बिताएंगे?

पानी के भीतर होटल
जब लग्ज़री होटल रूम की बात होती है तो कई लोग कल्पनाओं की उड़ान भरने लगते हैं. एक ऐसी ही कल्पना अब साकार होने जा रही है.
ये कल्पना है समुद्र में पानी के बीच बने होटल, जहां आप आरामदायक ही नहीं, बल्कि लहरों के नीचे, रंगबिरंगी मछलियों और समुद्री जीवों के बीच अनोखा अनुभव प्राप्त कर सकते हैं.

लहरों के नीचे मछलियों के बीच आने वाले दिनों में पेंटहाउस सुइट के बजाय समुद्र की सतह से 20 फीट नीचे स्थित कमरा लोगों की पहली पसंद बनकर उभर सकता है.
क्लिक करेंसोने की कल्पना ख़तरनाक लग सकती है लेकिन पानी के अंदर कमरे बनाने के लिए ज़रूरी तकनीक अच्छी तरह स्थापित और जाँची परखी है.
पानी के अंदर 'वाटर डिस्कस' नाम से होटल बनाने की योजना बना रही पोलैंड की कंपनी 'डीप ओशन टैक्नोलॉजी' में प्रोजेक्ट मैनेजर रॉबर्ट बर्सीविक्ज़ तो ऐसा ही मानते हैं.
इस होटल को खींचकर किसी भी उपयुक्त जगह पर ले जाया जा सकेगा और स्थापित किया जा सकेगा.
इस होटल में पानी के भीतर 22 कमरे होंगे. पानी की सतह के ऊपर भी इसी तरह का हिस्सा है और दोनों हिस्सों को सीढ़ियों और लिफ्ट से जोड़ने की योजना है.

फिल्टर

बर्सीविक्ज़ ने कहा, "अब ऐसी पनडुब्बियां बनाना संभव है जो समुद्र में 500 मीटर गहराई तक जा सकती हैं, तो पानी के नीचे होटल बनाना मुश्किल नहीं है."
उनका कहना है कि उस तकनीक को अब नए तरीक़े से इस्तेमाल किया जा रहा है.
पानी के भीतर होटल
पनडुब्बी बनाने से होटल बनाना आसान है क्योंकि होटल को 15 मीटर की गहराई से नीचे नहीं रखा जा सकता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पानी धूप के लिए फ़िल्टर का काम करता है और 15 मीटर से नीचे नीले रंग के अलावा बाक़ी रंग धुल जाते हैं.
इसका मतलब है कि क्लिक करेंसमुद्र की रंगारंग दुनिया को क़रीब से देखने के लिए होटल के कमरों को छिछले पानी में होना चाहिए.
पानी के भीतर होटल
बर्सीविक्ज़ का कहना है, "हमारी योजना 10 मीटर की गहराई तक कमरे मुहैया कराने की है क्योंकि इसी क्षेत्र में समुद्र का सबसे ख़ूबसूरत नजारा दिखाई देता है."
लेकिन इसमें सबसे बड़ी चुनौती पानी के नीचे स्थित होटल से होने वाले शोर को क़ाबू में रखना है. शोरगुल से मछलियां और दूसरे समुद्री जीव दूर भाग सकते हैं जिससे पानी के नीचे होटल बनाने का मकसद ही ख़त्म हो जाएगा.

डिजाइन

बर्सीविक्ज़ ने कहा कि सावधानी से डिजाइन बनाकर इस समस्या का समाधान ढूंढ लिया गया है. इसके लिए शौचालय, पंप और वातानुकूलन से जुड़े उपकरणों को होटल के बीच वाले हिस्से में रखा जाएगा.

पानी के भीतर होटल
साथ ही यह भी अहम है कि यह होटल स्थानीय क़ानूनों और नियमों का पालन करे. लेकिन यह जटिल मामला हो सकता है क्योंकि इस तरह के निर्माण में कौन से नियम लागू होंगे.
बर्सीविक्ज़ ने कहा, "समुद्री नियमों को लेकर हर देश के अपने अपने क़ानून हैं. इस होटल को आप पनडुब्बी जैसा उपकरण भी मान सकते हैं, एक जहाज़ भी मान सकते हैं या फिर समुद्र से तेल निकालने के लिए बनाया गया ढांचा भी मान सकते हैं."
इस होटल को स्थापित करने के लिए समुद्र में जगह खोजना भी मुश्किल हो सकता है.
साउथम्पटन विश्वविद्यालय में समुद्री क़ानूनों के विशेषज्ञ डॉक्टर एलेक्ज़ेंद्रोस तोवास के मुताबिक़ ब्रिटेन के तट से 12 नॉटिकल मील के अंदर होटल स्थापित किया जा सकता है लेकिन इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी. साथ ही इसे समुद्री पर्यावरण के लिए बनाए गए अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का भी पालन करना पड़ेगा.
पानी के भीतर होटल
लेकिन फिलहाल ऐसे होटल को क्लिक करेंब्रिटेन के जलक्षेत्र में बनाए जाने की कोई योजना नहीं है.

सर्फिंग और नौकायन

ब्रिटिश हॉस्पिटैलिटी एसोसिएशन के प्रवक्ता तबिता एल्डरिच स्मिथ का कहना है कि ऐसा होटल ब्रिटेन में शायद ही कभी बन पाए.
उन्होंने कहा, "ऐसा होटल शानदार होगा लेकिन हमारा ठंडा और ज्वार भाटा वाला समुद्री पानी भीतर ठहरने के बजाए सर्फिंग और नौकायन के लिए बेहतर हैं."
अमरीका के दक्षिण पूर्वी क्षेत्र में स्थित गरम पानी वाले समुद्र इसके लिए उपयुक्त हैं. फ्लोरिडा के तट पर स्थित दो बेडरूम वाला जूल्स अंडरसी लॉज साल 1986 से आंगतुकों को 31 फीट की गहराई पर ठहरा रहा है.
इस ढांचे को 1970 के दशक में प्यूर्तो रिको के तट पर समुद्री प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था.
लेकिन जूल्स का तरीका डीप सी टेक्नोलॉजी के प्रस्तावित होटल से अलग है. इसका पूरा ढांचा पानी के नीचे है और केवल स्कूबा गियर पहनकर ही वहां जाया जा सकता है.
तंज़ानिया में पेम्बा द्वीप के तट पर मांटा रिज़ॉर्ट में पानी के नीचे कमरे बने हैं. यह वॉटर डिस्कस या जूल्स अंडरसी लॉज की तरह समुद्र की तलहटी से नहीं जुड़ा है.

यह समुद्र की सतह पर तैर रहे एक ढांचे से जुड़ा है. बहने से बचने के लिए इसने नाव की तरह लंगर डाला है. आंगतुक तैर रहे ढांचे से सीढ़ियों के ज़रिए होटल के कमरों में घुसते हैं.

चीन का सुपरकंप्यूटर है दुनिया में सबसे तेज़


चीन, सुपरकंप्यूटर तियानहे-2
सुपरकंप्यूटर तियानहे-2 को इस साल जून में भी दुनिया का सबसे शक्तिशाली कंप्यूटर चुना गया था.
चीन के सुपरकंप्यूटर तियानहे-2 ने दुनिया के सबसे तेज़ कंप्यूटर सिस्टम का अपना ख़िताब बरकरार रखा है.
लिनपैक नामक मानक टेस्ट के अनुसार तियानहे-2 33.86 पेटाफ़्लॉप प्रति सेकेंड यानी 3,38,630 खरब प्रति सेकेंड की दर से गणना कर सकता है.

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तियानहे-2 पहली बार इस वर्ष जून में दुनिया का सबसे तेज़ कंप्यूटर सिस्टम बना था. जून में आई सूची में मात्र एक बदलाव हुआ है.
जर्मनी के मैनहिम विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर के नेतृत्व में साल में दो बार दुनिया के 500 सबसे तेज़ कंप्यूटरों की सूची बनाई जाती है.
इस सूची में दूसरे स्थान पर अमरीका का सुपरकंप्यूटर टाइटन है लेकिन तियानहे-2 के अंक टाइटन को मिले अंक से करीब दोगुने हैं.
टाइटन अमरीकी ऊर्जा विभाग का सुपरकंप्यूटर है और टेनिसी राज्य के ओक रिज़ नेशनल लेब्रोटरी में रखा हुआ है.

गति का मानक

दुनिया के सबसे तेज़ कंप्यूटर

तियानहे-2 (चीन) 33.86 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
टाइटन (अमरीका) 17.59 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
सिक्वोया (अमरीका) 17.17 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
के कंप्यूटर (जापान) 10.51 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
मीर (अमरीका) 8.59 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
पिज़ डेएंट (स्विट्जरलैंड) 6.27 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
स्टैंपीड (अमरीका) 5.17 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
जुक्वीन (जर्मनी) 5.09 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
वल्कैन (अमरीका) 4.29 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
सुपरमक(जर्मनी) 2.90 पेटाफ्लॉप प्रति सेकेंड
(स्रोत: टॉप500 सूची आरमैक्स लाइनपैक बेंचमार्क पर आधारित)
सूची बनाने के लिए एक ख़ास तरह के एकरेखीय समीकरण को हल करके कंप्यूटर की गति मापी जाती है.
इस परीक्षण में गणना की गति के अलावा डाटा ट्रांसफर जैसे मानकों का आकलन नहीं किया जाता. जबकि इनसे व्यावहारिक उपयोग के दौरान कंप्यूटर के प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ सकता है.
इस सूची में पहले दस स्थानों पर रहे कंप्यूटरों में से पाँच कंप्यूटरों के निर्माता आईबीएम ने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा कि अब इस सूची को तैयार करने की विधि को अब बदलने की ज़रूरत है और कंपनी इसी सप्ताह कोलाराडो के डेनेवर में होने वाले एक सम्मेलन में इस मुद्दे पर ज़ोर देगी.
आईबीएम के ज्यूरिच रिसर्च लैब के कंप्यूटेशनल साइंस विभाग के प्रमुख डॉ अलेसेंद्रो कुरिओनी ने बीबीसी से कहा, "किसी ख़ास समस्या को हल करने के आधार पर कंप्यूटर की क्षमता और उचच्-क्षमता के कंप्यूटरों के विकास की स्थिति मापने की विधि के अनुसार टॉप 500 की सूची बनाना पिछले दशकों तक उपयोगी तरीका था लेकिन अब हमें ज़्यादा व्यवहारिक तरीका अपनाने की जरूरत है जिससे व्यवहारिक उपयोग के दौरान इन सुपरकंप्यूटर के सबसे महत्वपूर्ण कार्य के आधार पर उनके प्रदर्शन का पता चले."

वास्तविक प्रदर्शन

अमरीका, सुपरकंप्यूटर, टाइटन
अमरीका के सुपरकंप्यूटर टाइटन को इस सूची में दूसरा स्थान मिला है.
एरिक स्ट्रोहमाएर कहते हैं, "लाइनपैक जैसे साधारण मानक के सहारे आज के जटिल कंप्यूटर सिस्टम में किसी अप्लीकेशन के वास्तविक प्रदर्शन के बारे में नहीं पता चल सकता."
चीनी भाषा में तियानहे-2 का अर्थ होता है मिल्की वे-2. इसे चीन की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेकनॉलजी ने विकसित किया है. यह चीन के दक्षिण-पूर्वी प्रांत गुआनडॉंग में रखा है.
इसमें इंटेल के बनाए कई तरह के मिश्रित प्रोसेसर का प्रयोग किया गया है. इसमें विश्वविद्यालय द्वारा डिज़ाइन किए गए ख़ास तरह के सीपीयू (सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट) का भी प्रयोग किया गया है.
हालाँकि सरे विश्वविद्यालय के कंप्यूटर विभाग के प्रोफ़ेसर एलेन वुडवर्ड का कहना है कि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि चीन का सुपरकंप्यूटर व्यवहारिक उपयोग में अमरीकी कंप्यूटर से बेहतर है या नहीं.

स्मार्टफ़ोन,स्मार्टवॉच के बाद अब सोनी का 'स्मार्टविग'


रंगीन विग
टेक्नोलॉजी कंपनी सोनी ने अपने प्रोडक्ट ‘स्मार्टविग’ के पेटेंट के लिए अर्ज़ी दाख़िल की है.
फ़िलहाल क्षेत्र में वैसी टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है जिन्हें पहना भी जा सकता है.

साथ ही इसमें डॉटा प्रोसेस करने की क्षमता भी मौजूद है.सोनी के दरख़्वास्त में कहा गया है कि स्मार्टविग को वैसे लोग भी पहन सकते हैं जिनके बाल मौजूद हों और ये संचार के दूसरे उपकरणों से भी संपर्क साध सकता है.
सर्मार्टवॉच
अर्ज़ी में मुहैया करवाई गई जानकारी के मुताबिक़ स्मार्टविग सड़क पर चलने के काम में मदद कर सकता है और ब्लड प्रेशर से संबंधित जानकारियां भी जुटा सकता है.

गूगल और सैमसंग भी

हाल के दिनों में गूगल और सैमंसग ने भी वैसे प्रोडक्ट बाज़ार में उतारे हैं जिन्हें ‘वियेरेबिल टेक्नोलॉजी’ के नाम से जाना जाता है यानी जिन्हें पहना जा सकता है और वो रोज़मर्रा और दूसरे कई तरह के कामों में उपभोक्ता की मदद कर सकते हैं.
जापानी कंपनी सोनी ने कहा कि ये विग घोड़ों, आदमी, याक, भैंस के बालों, ऊन, चिड़ियों के परों या दूसरी तरह कृत्रिम सामग्रियों से तैयार किए जा सकते हैं.
गूगल ग्लास
इसमें जो संचार उपकरण या सेंसर लगे होते हैं वो बालों से छुप जाते हैं.
सोनी का कहना है कि ये दृष्टिहीन लोगों के बहुत काम आ सकता है जैसे सड़क पार करने का काम.
कंपनी के एक प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा कि सोनी ने ये फ़ैसला नहीं किया है कि इसे बाज़ार में बिक्री के लिए कब उतारा जाएगा.