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आधुनिक शेरों की उत्पत्ति की कहानी



शेर
आधुनिक शेरों की उत्पत्ति और इतिहास का वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया है.
जीवित शेरों और म्यूज़ियम में मौजूद नमूनों के जेनेटिक विश्लेषण से पता चला है कि आधुनिक शेरों के सबसे क़रीबी पूर्वज 1,24,000 वर्ष पूर्व तक जीवित थे.
आधुनिक शेरों का विकास दो समूहों में हुआ. एक समूह पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में चला गया और दूसरा समूह पश्चिमी अफ्रीका और भारत.
दूसरे समूह के शेर अब लुप्तप्राय हैं. इसका मतलब हुआ कि आधुनिक शेरों की आधी जैव विविधता खत्म होने की कग़ार पर पहुंच चुकी है.
इस अध्ययन के नतीजों को  बीएमसी इवोल्यूशनरी बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित किया गया है.
शेरों के इतिहास को खोजना बेहद कठिन कार्य रहा है. हाल का समय इस प्रजाति के लिए काफी मुश्किल भरा रहा है क्योंकि इंसानी गतिविधियों के चलते उनके अस्तित्व पर संकट छा गया है.
जीवाश्म रिकॉर्ड में निरंतरता का अभाव और शेरों के बिखरे आवास वाले इलाके इतिहास की कड़ी को जोड़ने में सबसे बड़ी बाधा रहे हैं.

उद्भव

इसलिए वैज्ञानिकों के अंतरराष्ट्रीय समूह ने दुनियाभर के म्यूज़ियमों और संग्रह केंद्रों में शेरों की प्राचीन डीएनए को खोजना शुरू किया.
इंग्लैंड के डरहम विश्वविद्यालय से जुड़े डॉ. रॉस बर्नेट के नेतृत्व में इस टीम ने विभिन्न प्रजातियों की डीएनए का अध्ययन किया.
टीम ने विलुप्त हो चुके उत्तरी अफ़्रीका के बारबेरी शेर से लेकर विलुप्त इरानी और मध्य व पश्चिमी अफ़्रीकी शेरों के नमूनों का अध्ययन किया.
शोधकर्ताओं ने एशिया और अफ़्रीका के अन्य हिस्सों में जीवित शेरों के डीएनए से प्राचीन डीएनए का मिलान किया और पता लगाने की कोशिश की कि विभिन्न प्रजातियों का विकास कैसे हुआ.
अध्ययन में खुलासा हुआ कि इस समय शेरों की जो एकमात्र प्रजाति पैंथेरा लियो मौजूद है, वो पहली बार पूर्वी-दक्षिणी अफ़्रीका में दिखी थी.
लगभग 1,24,000 वर्ष पूर्व विभिन्न प्रजातियों का विकास शुरू हो गया था.

अनुवांशिक अंतर

यह वही समय है जब उष्णकटिबंधीय जंगलों का पूरे ध्रुवीय अफ़्रीका में प्रसार हुआ और सहारा क्षेत्र सवाना में बदल गया.
महाद्वीप के दक्षिण और पूर्व रहने वाले शेर अलग हो गए और उनका विकास पश्चिमी व उत्तरी हिस्से में रहने वाले शेरों से अलग होना शुरू हुआ.
इससे दोनों शेरों के बीच आया अनुवांशिक अंतर आज भी मौजूद है.
"पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेर सोमालिया या बोत्सवाना की अपेक्षा भारतीय शेरों की प्रजाति से ज्यादा मिलते जुलते हैं."
डॉ. रॉस बर्नेट, शोधकर्ता
51,000 वर्ष पूर्व महाद्वीप सूख गया और सहारा का प्रसार हुआ. इससे उत्तर और दक्षिण का इलाका अलग हो गया.
इसी समय पश्चिम में रहने वाले शेरों की पहुंच मध्य अफ़्रीका तक हो गई, जो वहां रहने के ज्यादा अनुकूल था.
तबसे नील समेत अफ़्रीका की बड़ी नदियां इन शेरों को अलग करने में बड़ी बाधा बनी रहीं.
प्राचीन डीएन के अध्ययन से यह भी खुलासा हुआ कि आधुनिक शेरों की प्रजाति ने 21,000 वर्ष पहले अफ़्रीका से बाहर की यात्रा शुरू की और अंततः भारत पहुंचे.
इसके बहुत बाद, लगभग 5,000 वर्ष पूर्व शेरों का एक और समूह महाद्वीप से बाहर गया और मध्यपूर्व में स्थित ईरान में पहुंचा.
ये शेर अब लुप्त हो चुके हैं.

बारबेरी प्रजाति

भारत के काठियावाड़ में 400 से भी कम एशियाई शेर (पी. लियो पर्सिका) बचे हैं. इस प्रजाति को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर द्वारा लुप्तप्राय घोषित किया जा चुका है.
डॉ. बर्नेट ने बताया, ''पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेर सोमालिया या बोत्सवाना की अपेक्षा शेरों की भारतीय प्रजाति से ज्यादा मिलते जुलते हैं.''
दोनों के बीच भारी भौगोलिक दूरी के बावजूद इनमें ईरानी शेरों और उत्तरी अफ़्रीका के बारबेरी शेरों से ज्यादा समानता दिखती है.
डॉ. बर्नेट ने बताया, ''यह जानकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि लुप्त बारबेरी शेरों और उत्तरी अफ़्रीका व भारतीय शेरों के बीच बहुत नज़दीकी रिश्ता है.''
अपने आकार और गुम इतिहास के चलेत विशाल मांसभक्षी जानवरों में बारबेरी शेर ज्यादा रहस्यमय हैं.
कभी उत्तरी अफ़्रीका में बहुतायत में पाए जाने वाले बारबेरी शेर शारीरिक रूप से एशिया और अफ़्रीका में अन्य जगहों पर पाए जाने वाले शेरों से विशिष्ट थे.
अभी तक ये निश्चित नहीं है कि कोई बारबेरी शेर ज़िंदा है या नहीं और संरक्षणवादी इस उप-प्रजाति को फिर से जीवित करने की कोशिश में हैं.

संरक्षण

साक्ष्य बताते हैं कि कुछ शेर मोरक्को के शाही परिवार के संग्रह के हिस्से के रूप में बचे हो सकते हैं.
हालांकि पूर्व में हुए शोध और ताज़ा अध्ययन से पता चलता है कि वो असली बारबेरी शेर नहीं थे.

ऐसे सुलझी गुत्थी

  • ब्रिटेन के टॉवर ऑफ लंदन में कभी कैद रखे गए दो बारबेरी शेरों की हड्डियों से गुत्थी सुलझी.
  • टॉवर में इन शेरों का संरक्षित कंकाल खोजा गया.
  • लुप्त हो चुके गुफ़ा शेरों का यह सबसे आधुनिक प्रमाण है.
  • ये 14वीं और 15वीं शताब्दी तक जीवित थे.
  • इस कंकाल के डीएन ने ही वैज्ञानिकों को बारबेरी और भारतीय शेर के बीच करीबी संबंध को खोजने में मदद की.
यदि ऐसा है और बारबेरी शेर खत्म हो चुके हैं तो नए अध्ययन का नजीजा बताता है कि अनुवांशिक रूप से ज्यादा करीबी रहे भारतीय शेरों को उनके प्राकृतिक आवास में पुनः भेजा जा सकता है.
डॉ. बर्नेट के अनुसार, भविष्य में उत्तरी अफ़्रीका में शेरों को ले जाना एक जटिल प्रक्रिया होगी. ऐसे में उनका प्रजनन एक तरीका हो सकता है.
अफ़्रीका के शेरों की लगभग एक तिहाई संख्या पिछले 20 वर्षों में ग़ायब हुई है.
शोधकर्ता पश्चिमी और मध्य अफ़्रीका के शेरों को लेकर सबसे ज़्यादा चिंता जताते हैं, जो कि लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके हैं. इन दोनों इलाकों में क्रमशः 400 से 800 और 900 शेर बचे हुए हैं.
इन प्रजातियों के कुछ शेरों को चिड़ियाघरों में संरक्षित कर रखा गया है.

म्हत्वपूर्ण तिथि

भारत का इतिहास
पाषाण युग- 70000 से 3300 ई.पू
मेहरगढ़ संस्कृति7000-3300 ई.पू
सिन्धु घाटी सभ्यता- 3300-1700 ई.पू
हड़प्पा संस्कृति1700-1300 ई.पू
वैदिक काल- 1500–500 ई.पू
प्राचीन भारत- 1200 ई.पू–240 ई.
महाजनपद700–300 ई.पू
मगध साम्राज्य545–320 ई.पू
सातवाहन साम्राज्य230 ई.पू-199 ई.
मौर्य साम्राज्य321–184 ई.पू
शुंग साम्राज्य184–123 ई.पू
शक साम्राज्य123 ई.पू–200 ई.
कुषाण साम्राज्य60–240 ई.
पूर्व मध्यकालीन भारत- 240 ई.पू– 800 ई.
चोल साम्राज्य250 ई.पू- 1070 ई.
गुप्त साम्राज्य280–550 ई.
पाल साम्राज्य750–1174 ई.
प्रतिहार साम्राज्य830–963 ई.
राजपूत काल900–1162 ई.
मध्यकालीन भारत 500 ई.– 1761 ई.
दिल्ली सल्तनत
ग़ुलाम वंश
ख़िलजी वंश
तुग़लक़ वंश
सैय्यद वंश
लोदी वंश
मुग़ल साम्राज्य
1206–1526 ई.
1206-1290 ई.
1290-1320 ई.
1320-1414 ई.
1414-1451 ई.
1451-1526 ई.
1526–1857 ई.
दक्कन सल्तनत
बहमनी वंश
निज़ामशाही वंश
1490–1596 ई.
1358-1518 ई.
1490-1565 ई.
दक्षिणी साम्राज्य
राष्ट्रकूट वंश
होयसल साम्राज्य
ककातिया साम्राज्य
विजयनगर साम्राज्य
1040-1565 ई.
736-973 ई.
1040–1346 ई.
1083-1323 ई.
1326-1565 ई.
आधुनिक भारत- 1762–1947 ई.
मराठा साम्राज्य1674-1818 ई.
सिख राज्यसंघ1716-1849 ई.
औपनिवेशिक काल1760-1947 ई.

Jurassic period

Jurassic


The Jurassic period is the second of the three divisions of the Mesozoic era, "The Age of Reptiles." The Jurassic lasted for 64 million years, from about 208 to 144 million years ago. The period is named for rock strata found in the Jura Mountains on the border between Switzerland and France.

During the Jurassic, the supercontinent Pangaea began to break apart. This created two landmasses, a             northern mass called Laurasia (North America,Europe, and Asia) and a southern mass called Gondwanaland (South America, Africa, Australia, Antarctica, and India). During the early Jurassic, North America separated from Africa and South America and moved northward, but still remained connected to Europe. By the late Jurassic, the North Atlantic was just beginning to appear between Europe and North America.
Widespread deposits of sand in western North America indicate that the region experienced a desert climate during the early Jurassic. Coral reefs and the remains of temperate and subtropical forests around

the world provide evidence that the climate became moister and milder later in the period. Europe was covered with shallow seas throughout the Jurassic.
Jurassic vegetation consisted mainly of seed ferns, cycads, horsetails, conifers, and gingkoes. The Jurassic is sometimes called the "Age of Cycads" because of the variety and diversity of these seed-bearing, palmlike plants. Some cycads grew to be tall as trees; other forms were short and squat.
In the marine world, the great success story was that of the ammonites —the coiled, shelled relatives of modern squid. At the end of the Triassic (the period just before the Jurassic), nearly 47 percent of marine species went extinct, indicating a drastic rapid deterioration of the environment that results in a crisis for certain species and is known as an extinction event. Extinction events allow some species to adapt to different environmental conditions and fill new niches. This is known as adaptive radiation. Although only one family of ammonites survived an extinction event at the end of the Triassic, this family radiated into an astonishing array of forms, some of which attained sizes of 2 meters (6 feet) or more.
The Jurassic period is known for an increase in the numbers and diversity of dinosaurs. At the beginning of the period, dinosaurs such as the bipedal and carnivorous theropods were small and lightly boned, feeding on insects or other small dinosaurs. By the close of the period, massive predators like Allosaurus and Ceratosaurus had appeared. These dinosaurs had heavy bodies, powerful hind legs, front limbs used for grasping and holding prey, and long, sharp teeth for spearing and stabbing. The largest of all dinosaurs, the plant-eating sauropods, also developed during the Jurassic. The sauropods include Apatosaurus (formerly called Brontosaurus), Brachiosaurus, Diplodocus, Seismosaurus, and Suprasaurus. These animals were quadrupeds, with pillarlike legs (like the legs of an elephant) that supported their enormous body weight, which was often 18 metric tons (20 tons) or more. The large size of the sauropods may have helped them maintain a consistent body temperature. The Stegosaurus is known for a distinctive row of heavy, triangular, bony plates, known as scutes, which were arranged along its back. Paleontologists (scientists who study dinosaurs) believe these plates helped the Stegosaurus regulate its body temperature and protected it from being eaten. Several sharp, bony spikes on the end of the tail of Stegosaurus probably served as a weapon against attack.
The debate continues as to whether birds most likely evolved from small, bipedal dinosaurs or other ground-dwelling reptilian ancestors. Archaeopteryx is one of the earliest undisputed bird fossils. It exhibits features of both dinosaurs and birds, including a long, bony tail; small, sharp teeth; feathers; and a "wishbone" that allowed for the attachment of flight muscles.
EraPeriodEpochMillion Years Before Present
MesozoicCretaceous144
Jurassic208
Triassic245
Mammals continued to diversify during the Jurassic, but remained small and nocturnal, possibly to avoid competition with the dinosaurs. These early mammals were almost all herbivores, insectivores, and frugivores (fruit eaters).
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credits=encyclopedia.com,google.com

मुग़ल और अफ़ग़ान (1525-1556)


सिन्धु नदीपन्द्रहवीं शताब्दी में मध्य और पश्चिम एशिया में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। चौदहवीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य के विघटन के पश्चात तैमूरने ईरान और तूरान को फिर से एक शासन के अंतर्गत संगठित किया। तैमूर का साम्राज्य वोलगा नदी के निचले हिस्से से सिन्धु नदी तक फैला हुआ था और उसमें एशिया का माइनर (आधुनिक तुर्की), ईरान, ट्रांस-आक्सियाना, अफ़ग़ानिस्तान और पंजाब का एक भाग था। 1404 में तैमूर की मृत्यु हो गई। लेकिन उसके पोते शाहरूख मिर्ज़ा ने साम्राज्य का अधिकांश भाग संगठित रखा। उसके समय में समरकन्द और हिरातपश्चिम एशिया के सांस्कृतिक केन्द्र बन गए। प्रत्येक समरकन्द के शासक का इस्लामी दुनिया में काफ़ी सम्मान था। पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में देशों का सम्मान तेज़ी से कम हुआ। इसका कारण तैमूर के साम्राज्य को विभाजित करने की परम्परा थी। अनेक तैमूर रियासतें, जो इस प्रक्रिया में बनी, आपस में लड़ती-झगड़ती रहीं। इससे नये तत्वों को आगे बढ़ने का मौक़ा मिला। उत्तर से एक मंगोल जाति उज़बेक ने ट्रांस-आक्सीयाना में अपने क़दम बढ़ाये। उज़बेकों ने इस्लाम अपना लिया था। लेकिन तैमूरी उन्हें असंस्कृत बर्बर ही समझते थे। और पश्चिम की ओर ईरान में सफ़वीं वंश का उदय हुआ। सफ़वी सन्तों की परम्परा में पनपे थे। जो स्वयं को पैग़म्बर के वंशज मानते थे। वे मुसलमानों के शिया मत का समर्थन करते थे और उन्हें परेशान करते थे जो शिया सिद्धांतों को अस्वीकार करते थे। दूसरी ओर उज़बेक सुन्नी थे। इसलिए उन दोनों तत्वों के बीच संघर्ष साम्प्रदायिक मतभेद के कारण और भी बढ़ गया। ईरान के भी पश्चिम में आटोमन तुर्कों की शक्ति उभर रही थी। जो पूर्वी यूरोप तथा ईराक और ईरान पर अधिपत्य ज़माना चाहते थे। इस प्रकार सोलहवीं शताब्दी में एशिया में तीन बड़ी साम्राज्य शक्तियों के बीच संघर्ष की भूमिका तैयार हो गईबाबर1494 में ट्रांस-आक्सीयाना की एक छोटी सी रियासत फ़रग़ना का बाबर उत्तराधिकारी बना। उज़बेक ख़तरे से बेख़बर होकर तैमूर राजकुमार आपस में लड़ रहे थे। बाबर ने भी अपने चाचा से समरकन्द छीनना चाहा। उसने दो बार उस शहर को फ़तह किया, लेकिन दोनों ही बार उसे जल्दी ही छोड़ना पड़ा। दूसरी बार उज़बेक शासक शैबानी ख़ान को समरकन्द से बाबर को खदेड़ने के लिए आमंत्रित किया गया था। उसने बाबर को हराकर समरकन्दर पर अपना झंडा फहरा दिया। उसके बाद जल्दी ही उसने उस क्षेत्र में तैमूर साम्राज्य के भागों को भी जीत लिया। इससे बाबर को क़ाबुल की ओर बढ़ना पड़ा और उसने 1504 में उस पर अधिकार कर लिया। उसके बाद चौदह वर्ष तक वह इस अवसर की तलाश में रहा कि फिर उज़बेकों को हराकर अपनी मातृभूमि पर पुनः अधिकार कर सके। उसने अपने चाचा, हिरात के शासक को अपनी ओर मिलाना चाहा, लेकिन इस कार्य में वह सफल नहीं हुआ। शैबानी ख़ान ने अंततः हिरात पर भी अधिकार कर लिया। इससे सफ़वीयों से उसका सीधा संघर्ष उत्पन्न हो गया। क्योंकि वे भी हिरात और उसके आस-पास के क्षेत्र को अपना कहते थे। इस प्रदेश को तत्कालीन लेखकों ने ख़ुरासान कहा है। 1510 की प्रसिद्ध लड़ाई में ईरान के शाह इस्माइल ने शैबानी को हराकर मार डाला। इसी समय बाबर ने समरकन्द जीतने का एक प्रयत्न और किया। इस बार उसने ईरानी सेना की सहायता ली। वह समरकन्द पहुंच गया। लेकिन जल्दी ही ईरानी सेनापतियों के व्यवहार के कारण रोष से भर गया। वे उसे ईरानी साम्राज्य का एक गवर्नर ही मानते थे। स्वतंत्र शासक नहीं। इसी बीच उज़बेक भी अपनी हार से उभर गये। बाबर को एक बार फिर समरकन्द से खदेड़ दिया गया और उसे क़ाबुल लौटना पड़ा। स्वयं शाह ईरान इस्माइल को भी आटोहान-साम्राज्य के साथ हुई प्रसिद्ध लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा। इस प्रकार उज़बेक ट्रांस-आक्सीयाना के निर्विरोध स्वामी हो गए। इन घटनाऔं के कारण ही अन्ततः बाबर ने भारत की ओर रूख किया।
बाबर ने लिखा है कि क़ाबुल जीतने (1504) से लेकर पानीपत की लड़ाई तक उसने हिन्दुस्तान जीतने का विचार कभी नहीं त्यागा। लेकिन उसे भारत विजय के लिए कभी सही अवसर नहीं मिला था। "कभी अपने बेगों के भय के कारण, कभी मेरे और भाइयों के बीच मतभेद के कारण।" मध्य एशिया के कई अन्य आक्रमणकारियों की भांति बाबर भी भारत की अपार धन-राशि के कारण इसकी ओर आकर्षित हुआ था। भारत सोने की क़ान था। बाबर का पूर्वज तैमूर यहाँ से अपार धन-दौलत और बड़ी संख्या में कुशल शिल्पी ही नहीं ले गया था, जिन्होंने बाद में उसके एशिया साम्राज्य को सुदृढ़ करने और उसकी राजधानी को सुन्दर बनाने में योगदान दिया, बल्कि पंजाब के एक भाग को अपने कब्जे में कर लिया था। ये भाग अनेक पीढ़ियों तक तैमूर के वंशजों के अधीन रहे थे। जब बाबर ने अफ़ग़ानिस्तान पर विजय प्राप्त की तो उसे लगा कि इन दोनों पर भी उसका क़ानूनी अधिकार है
।
इब्राहीम लोदीक़ाबुल की सीमित आय भी पंजाब परगना को विजित करने का एक कारण थी। "उसका (बाबर) राज्य बदखशां, कंधार और क़ाबुल पर था। जिनसे सेना की अनिवार्यताएं पूरी करने के लिए भी आय नहीं होती थी। वास्तव में कुछ सीमा प्रान्तों पर सेना बनाए रखने में और प्रशासन के काम में व्यय आमदनी से ज़्यादा था।"सीमित आय साधनों के कारण बाबर अपने बेगों और परिवार वालों के लिए अधिक चीज़ें उपलब्ध नहीं कर सकता था। उसे क़ाबुल पर उज़बेक आक्रमण का भी भय था। वह भारत को बढ़िया शरण-स्थल समझता था। उसकी दृष्टि में उज़बेकों के विरुद्ध अभियानों के लिए भी यह अच्छा स्थल था। उत्तर-पश्चिम भारत की राजनीतिक स्थिति ने बाबर को भारत आने का अवसर प्रदान किया। 1517 में सिकन्दर लोदी की मृत्यु हो गई थी और इब्राहीम लोदीगद्दी पर बैठा था। एक केन्द्राभिमुखी बड़ा साम्राज्य स्थापित करने के इब्राहिम के प्रयत्नों ने अफ़ग़ानों और राजपूतों दोनों को सावधान कर दिया था। अफ़ग़ान सरदारों में सर्वाधिक शक्तिशाली सरदार दौलत ख़ाँ लोदी था। जो पंजाब का गवर्नर था। पर वास्तव में लगभग स्वतंत्र था। दौलत ख़ाँ ने अपने बेटे को इब्राहिम लोदी के दरबार में उपहार देखकर उसे मनाने का प्रयत्न किया। साथ ही साथ वह भीरा का सीमान्त प्रदेश जीतकर अपनी स्थिति को भी मज़बूत बनाना चाहता था। 1518-19 में बाबर ने भीरा के शक्तिशाली क़िले को जीत लिया। फिर उसने दौलत ख़ाँ और इब्राहिम लोदी को पत्र और मौखिक संदेश भेजकर यह मांग की कि जो प्रदेश तुर्कों के हैं, वे उसे लौटा दिए जाएं। लेकिन दौलत ख़ाँ ने बाबर के दूत को लाहौर में अटका लिया। वह न स्वयं उससे मिला और न उसे इब्राहिम लोदी के पास जाने दिया। जब बाबर क़ाबुल लौट गया, तो दौलत ख़ाँ ने भीरा से उसके प्रतिनिधियों को निकाल बाहर किया।1520-21 में बाबर ने एक बार फिर सिंधु नदी पार की और आसानी से भीरा और सियालकोट पर क़ब्ज़ा कर लिया। ये भारत के लिए मुग़ल द्वार थे। लाहौर भी पदाक्रांत हो गया। वह सम्भवतः और आगे बढ़ता, लेकिन तभी उसे कन्धार में विद्रोह का समाचार मिला। वह उल्टे पांव लौट गया और डेढ़ साल के घेरे के बाद कन्धार को जीत लिया। उधर से निश्चिंत होकर बाबर की निगाहें फिर भारत की ओर उठीं। इसी समय के लगभग बाबर के पास दौलत ख़ाँ लोदी के पुत्र दिलावर ख़ाँ के नेतृत्व में दूत पहुंचे। उन्होंने बाबर को भारत आने का निमंत्रण दिया और कहा कि चूंकि इब्राहिम लोदी अत्याचारी है और उसके सरदारों का समर्थन अब उसे प्राप्त नहीं है, इसलिए उसे अपदस्थ करके बाबर राजा बने। इस बात की सम्भावना है कि राणा सांगा का दूत भी इसी समय उसके पास पहुंचा। इन दूतों के पहुंचने पर बाबर को लगा कि यदि हिन्दुस्तान को नहीं, तो सारे पंजाब को जीतने का समय आ गया है। 1525 में जब बाबर पेशावर में था, उसे ख़बर मिली कि दौलतख़ाँ लोदी ने फिर से अपना पाला बदल लिया है। उसने 30,000-40,000 सिपाहियों को इकट्ठा कर लिया था और बाबर की सेनाओं को स्यालकोट से खदेड़ने के बाद लाहौर की ओर बढ़ रहा था। बाबर से सामना होने पर दौलत ख़ाँ लोदी की सेना बिखर गई। दौलत ख़ाँ ने आत्मसमर्पण कर दिया और बाबर ने उसे माफ़ी दे दी। इस प्रकार सिंधु नदी पार करने के तीन सप्ताह के भीतर ही पंजाब पर बाबर का क़ब्ज़ा हो गयापानीपत युद्ध21 अप्रैल, 1526दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ संघर्ष अवश्यम्भावी था। बाबर इसके लिए तैयार था और उसने दिल्ली की ओर बढ़ना शृरू किया। इब्राहिम लोदी ने पानीपत में एक लाख सैनिकों को और एक हज़ार हाथियों को लेकर बाबर का सामना किया। क्योंकि हिन्दुस्तानी सेनाओं में एक बड़ी संख्या सेवकों की होती थी, इब्राहिम की सेना में लड़ने वाले सिपाही कहीं कम रहे होंगे। बाबर ने सिंधु को जब पार किया था तो उसके साथ 12000 सैनिक थे, परन्तु उसके साथ वे सरदार और सैनिक भी थे जो पंजाब में उसके साथ मिल गये थे। इस प्रकार उसके सिपाहियों की संख्या बहुत अधिक हो गई थी। फिर भी बाबर की सेना संख्या की दृष्टि से कम थी। बाबर ने अपनी सेना के एक अंश को शहर में टिका दिया जहां काफ़ी मकान थे, फिर दूसरे अंश की सुरक्षा उसने खाई खोद कर उस पर पेड़ों की डालियां डाल दी। सामने उसने गाड़ियों की कतार खड़ी करके सुरक्षात्मक दीवार बना ली। इस प्रकार उसने अपनी स्थिति काफ़ी मज़बूत कर ली। दो गाड़ियों के बीच उसने ऎसी संरचना बनवायी, जिस पर सिपाही अपनी तोपें रखकर गोले चला सकत थे। बाबर इस विधि को आटोमन (रूमी) विधि कहता था। क्योंकि इसका प्रयोग आटोमनों ने ईरान के शाह इस्माईल के विरुद्ध हुई प्रसिद्ध लड़ाई में किया था। बाबर ने दो अच्छे निशानेबाज़ तोपचियों उस्ताद अली और मुस्तफ़ा की सेवाएं भी प्राप्त कर ली थीं। भारत में बारूद का प्रयोग धीरे-धीरे होना शुरू हुआ। बाबर कहता है कि इसका प्रयोग सबसे पहले उसने भीरा के क़िले पर आक्रमण के समय किया था। ऎसा अनुमान है कि बारूद से भारतीयों का परिचय तो था, लेकिन प्रयोग बाबर के आक्रमण के साथ ही आरम्भ हुआ।बाबर की सुदृढ़ रक्षा-पंक्ति का इब्राहिम लोदी को कोई आभास नहीं था। उसने सोचा कि अन्य मध्य एशियायी लड़ाकों की तरह बाबर भी दौड़-भाग कर युद्ध लड़ेगा और आवश्यकतानुसार तेज़ी से आगे बढ़ेगा या पीछे हटेगा। सात या आठ दिन तक छुट-पुट झड़पों के बाद इब्राहिम लोदी की सेना अन्तिम युद्ध के लिए मैदान में आ गई। बाबर की शक्ति देखकर लोदी के सैनिक हिचके इब्राहिम लोदी अभी अपनी सेना को फिर से संगठित कर ही रहा था कि बाबर की सेना के आगे वाले दोनों अंगों ने चक्कर लगा कर उसकी सेना पर पीछे और आगे से आक्रमण कर दिया। सामने की ओर बाबर के तोपचियों ने अच्छी निशानेबाज़ी की लेकिन बाबर अपनी विजय का अधिकांश श्रेय अपने तीर अन्दाज़ों को देता है। यह आश्चर्य की बात है कि वह इब्राहिम के हाथियों का उल्लेख नहीं के बराबर करता है। यह स्पष्ट है कि इब्राहिम को उनके इस्तेमाल का समय ही नहीं मिला।प्रारम्भिक धक्कों के बावजूद इब्राहिम की सेना वीरता से लड़ी। दो या तीन घंटों तक युद्ध होता रहा। इब्राहिम 5000-6000 हज़ार सैनिकों के साथ अन्त तक लड़ता रहा। अनुमान है कि इब्राहिम के अतिरिक्त उसके 15000 से अधिक सैनिक इस लड़ाई में मारे गये।पानीपत की लड़ाई भारतीय इतिहास में एक निर्णायक लड़ाई मानी जाती है। इसमें लोदियों की कमर टूट गई और दिल्ली और आगरा का सारा प्रदेश बाबर के अधीन हो गया। इब्राहिम लोदी द्वारा आगरा में एकत्र ख़ज़ाने से बाबर की आर्थिक कठिनाइयां दूर हो गई। जौनपुर तक का समृद्ध क्षेत्र भी बाबर के सामने खुला था। लेकिन इससे पहले की बाबर इस पर अपना अधिकार सुदृढ़ कर सके उसे दो कड़ी लड़ाइयां लड़नी पड़ी, एक मेवाड़ के विरुद्ध दूसरी पूर्वी अफ़ग़ानों के विरुद्ध। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो पानीपत की लड़ाई राजनीतिक क्षेत्र में इतनी निर्णायक नहीं थी जितनी की समझी जाती है। इसका वास्तविक महत्त्व इस बात में है कि इसने उत्तर भारत पर आधिपत्य के लिए संघर्ष का एक नया युग प्रारम्भ किया।पानीपत की लड़ाई में विजय के बाद बाबर के सामने बहुत सी कठिनाइयाँ आईं। उसके बहुत से बेग भारत में लम्बे अभियान के लिये तैयार नहीं थे। गर्मी का मौसम आते ही उनके संदेह बढ़ गये। वे अपने घरों से दूर तक अनजाने और शत्रु देश में थे। बाबर कहता है कि भारत के लोगों ने 'अच्छी शत्रुता' निभाई, उन्होंने मुग़ल सेनाओं के आने पर गांव ख़ाली कर दिए। निःसन्देह तैमूर द्वारा नगरों और गांवों की लूटपाट और क़त्लेआम उनकी याद में ताज़ा थे।बाबर यह बात जानता था कि भारतीय साधन ही उसे एक दृढ़ साम्राज्य बनाने में मदद दे सकते हैं और उसके बेगों को भी संतुष्ट कर सकते हैं। "क़ाबुल की ग़रीबी हमारे लिए फिर नहीं" वह अपनी डायरी में लिखता है। इसलिए उसने दृढ़ता से काम लिया, और भारत में रहने की अपनी इच्छा ज़ाहिर कर दी और उन बेगों को छुट्टी दे दी जो क़ाबुल लौटना चाहते थे। इससे उसका रास्ता साफ़ हो गया। लेकिन इससे राणा साँगा से भी उसकी शत्रुता हो गयी, जिसने उससे दो-दो हाथ करने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं।बाबरनामा(हिंदी अनुवाद)पूर्वी राजस्थान और मालवा पर आधिपत्य के लिए राणा साँगा और इब्राहिम लोदी के बीच बढ़ते संघर्ष का संकेत पहले ही किया जा चुका है। मालवा के महमूद ख़िल्जी को हराने के बाद राणा साँगा प्रभाव आगरा के निकट एक छोटी-सी नदी पीलिया ख़ार तक धीरे-धीरे बढ़ गया था। सिंधु-गंगा घाटी में बाबर द्वारा साम्राज्य की स्थापना से राणा साँगा को ख़तरा बढ़ गया। साँगा ने बाबर को भारत से खदेड़ने, कम-से-कम उसे पंजाब तक सीमित रखने के लिए तैयारियाँ शुरू कर दीं।राणा साँगा और बाबरबाबर ने राणा साँगा पर संधि तोड़ने का दोष लगाया। वह कहता है कि राणा साँगा ने मुझे हिन्दुस्तान आने का न्योता दिया और इब्राहिम लोदी के ख़िलाफ़ मेरा साथ देने का वायदा किया, लेकिन जब मैं दिल्ली और आगरा फ़तह कर रहा था, तो उसने पांव भी नहीं हिलाये। इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि राणा साँगा ने बाबर के साथ क्या समझौता किया था। हो सकता है कि उसने एक लम्बी लड़ाई और कल्पना की हो और सोचा हो कि तब तक वह स्वयं उन प्रदेशों पर अधिकार कर सकेगा जिन पर उसकी निगाह थी या, शायद उसने यह सोचा हो कि दिल्ली को रौंद कर लोदियों की शक्ति को क्षीण करके बाबर भी तैमूर की भाँति लौट जायेगा। बाबर के भारत में ही रुकने के निर्णय ने परिस्थिति को पूरी तरह से बदल दिया।इब्राहिम लोदी के छोटे भाई महमूद लोदी सहित अनेक अफ़ग़ानों ने यह सोच कर राणा साँगा का साथ दिया कि अगर वह जीत गया, तो शायद उन्हें दिल्ली की गद्दी वापस मिल जायेगी। मेवात के शासक हसन ख़ाँ मेवाती ने भी राणा साँगा का पक्ष लिया। लगभग सभी बड़ी राजपूत रियासतों ने राणा की सेवा में अपनी-अपनी सेनाएँ भेजीं।जिहाद का नाराराणा साँगा की प्रसिद्धि और बयाना जैसी बाहरी मुग़ल छावनियों पर उसकी प्रारम्भिक सफलताओं से बाबर के सिपाहियों का मनोबल गिर गया। उनमें फिर से साहस भरने के लिए बाबर ने राणा साँगा के ख़िलाफ़ 'जिहाद' का नारा दिया। लड़ाई से पहले की शाम उसने अपने आप को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के लिए शराब के घड़े उलट दिए और सुराहियाँ फोड़ दी। उसने अपने राज्य में शराब की ख़रीदफ़रोख़्त पर रोक लगा दी और मुसलमानों पर से सीमा कर हटा दिया।बाबर ने बहुत ध्यान से रणस्थली का चुनाव किया और वह आगरा से चालीस किलोमीटर दूर खानवा पहुँच गया। पानीपत की तरह ही उसने बाहरी पंक्ति में गाड़ियाँ लगवा कर और उसके साथ खाई खोद कर दुहरी सुरक्षा की पद्धति अपनाई। इन तीन पहियों वाली गाड़ियों की पंक्ति में बीच-बीच में बन्दूक़चियों के आगे बढ़ने और गोलियाँ चलाने के लिए स्थान छोड़ दिया गया।राणा साँगा की पराजयग्वालियर का क़िलाखानवा की लड़ाई (1527) में ज़बर्दस्त संघर्ष हुआ। बाबर के अनुसार साँगा की सेना में 200,000 से भी अधिक सैनिक थे। इनमें 10,000 अफ़ग़ान घुड़सवार और इतनी संख्या में हसन ख़ान मेवाती के सिपाही थे। यह संख्या भी, और स्थानों की भाँति बढ़ा-बढ़ा कर कही गई हो सकती है, लेकिन बाबर की सेना निःसन्देह छोटी थी। साँगा ने बाबर की दाहिनी सेना पर ज़बर्दस्त आक्रमण किया और उसे लगभग भेद दिया। लेकिन बाबर के तोपख़ाने ने काफ़ी सैनिक मार गिराये और साँगा को खदेड़ दिया गया। इसी अवसर पर बाबर ने केन्द्र-स्थित सैनिकों से, जो गाड़ियों के पीछे छिपे हुए थे, आक्रमण करने के लिए कहा। ज़जीरों से गाड़ियों से बंधे तोपख़ाने को भी आगे बढ़ाया गया। इस प्रकार साँगा की सेना बीच में घिर गई और बहुत से सैनिक मारे गये। साँगा की पराजय हुई। राणा साँगा बच कर भाग निकला ताकि बाबर के साथ फिर संघर्ष कर सके परन्तु उसके सामन्तों ने ही उसे ज़हर दे दिया जो इस मार्ग को ख़तरनाक और आत्महत्या के समान समझते थे। इस प्रकार राजस्थान का सबसे बड़ा योद्धा अन्त को प्राप्त हुआ। साँगा की मृत्यु के साथ ही आगरा तक विस्तृत संयुक्त राजस्थान के स्वप्न को बहुत धक्का पहुँचा।खानवा की लड़ाई से दिल्ली-आगरा में बाबर की स्थिति सुदृढ़ हो गई। आगरा के पूर्व में ग्वालियर और धौलपुर जैसे क़िलों की शृंखला जीत कर बाबर ने अपनी स्थिति और भी मज़बूत कर ली। उसने हसन ख़ाँ मेवाती से अलवर का बहुत बड़ा भाग भी छीन लिया। फिर उसने मालवा-स्थित चन्देरी के मेदिनी राय के विरुद्ध अभियान छेड़ा। राजपूत सैनिकों द्वारा रक्त की अंतिम बूँद तक लड़कर जौहर करने के बाद चन्देरी पर बाबर का राज्य हो गया। बाबर को इस क्षेत्र में अपने अभियान को सीमित करना पड़ा क्योंकि उसे पूर्वी उत्तर प्रदेश में अफ़ग़ानों की हलचल की ख़बर मिली।तैमूरबाबरदिल्ली विजयलोदीकन्धार में विद्रोहपानीपत की लड़ाईइब्राहिम लोदी की कमज़ोरीलोदियों की हारखानवा की लड़ाई

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टीपू सुल्तान


टीपू सुल्तान (अंग्रेज़ी: Tipu Sultan, जन्म: 20 नवम्बर, 1750 ई. ; मृत्यु- 4 मई 1799 ई.) भारतीय इतिहासके प्रसिद्ध योद्धा हैदर अली का पुत्र था। पिता की मृत्यु के बाद पुत्र टीपू सुल्तान ने मैसूर सेना की कमान को संभाला था, जो अपनी पिता की ही भांति योग्य एवं पराक्रमी था। टीपू को अपनी वीरता के कारण ही 'शेर-ए-मैसूर' का ख़िताब अपने पिता से प्राप्त हुआ था। टीपू द्वारा कई युद्धों में हारने के बाद मराठों एवं निज़ाम ने अंग्रेज़ों से संधि कर ली थी। ऐसी स्थिति में टीपू ने भी अंग्रेज़ों से संधि का प्रस्ताव किया और चूंकि अंग्रेज़ों को भी टीपू की शक्ति का अहसास हो चुका था, इसलिए छिपे मन से वे भी संधि चाहते थे। दोनों पक्षों में वार्तामार्च, 1784 में हुई और इसी के फलस्वरूप 'मंगलौर की संधि' सम्पन्न हुई।
कई बार अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा देने वाले टीपू सुल्तान को भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने विश्व का सबसे पहला रॉकेट अविष्कारक बताया था।
टीपू सुल्तान का जन्म मैसूर के सुल्तान हैदर अली के घर 20 नवम्बर, 1750 को 'देवनहल्ली', वर्तमान मेंकर्नाटक का कोलार ज़िला में हुआ था। टीपू सुल्तान का पूरा नाम फ़तेह अली टीपू था। वह बड़ा वीर, विद्याव्यसनी तथा संगीत और स्थापत्य का प्रेमी था। उसके पिता ने दक्षिण में अपनी शक्ति का विस्तार आरंभ किया था। इस कारण अंग्रेज़ों के साथ-साथ निजाम और मराठे भी उसके शत्रु बन गए थे। टीपू ने 18 वर्ष की उम्र में अंग्रेज़ों के विरूद्ध पहला युद्ध जीता था। अंग्रेज़ संधि करने को बाध्य हुए। लेकिन पांच वर्ष बाद ही संधि को तोड़कर निजाम और मराठों को साथ लेकर अंग्रेज़ों ने फिर आक्रमण कर दिया। टीपू सुल्तान ने अरब, काबुल, फ्रांस आदि देशों में अपने दूत भेजकर उनसे सहायता मांगी, पर सफलता नहीं मिली। अंग्रेज़ों को इन कार्रवाइयों का पता था। अपने इस विकट शत्रु को बदनाम करने के लिए अंग्रेज़ इतिहासकारों ने इसे धर्मांध बताया है। परंतु वह बड़ा सहिष्णु राज्याध्यक्ष था। यद्यपि भारतीय शासकों ने उसका साथ नहीं दिया, पर उसने किसी भी भारतीय शासक के विरूद्ध, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान, अंग्रेज़ों से गठबंधन नहीं किया।
टीपू सुल्तान काफ़ी बहादुर होने के साथ ही दिमागी सूझबूझ से रणनीति बनाने में भी बेहद माहिर था। अपने शासनकाल में भारत में बढ़ते ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्य के सामने वह कभी नहीं झुका और उसने अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया। मैसूर की दूसरी लड़ाई में अंग्रेज़ों को खदेड़ने में उसने अपने पिता हैदर अली की काफ़ी मदद की। उसने अपनी बहादुरी से जहाँ कई बार अंग्रेज़ों को पटखनी दी, वहीं निज़ामों को भी कई मौकों पर धूल चटाई। अपनी हार से बौखलाए हैदराबाद के निज़ाम ने टीपू सुल्तान से गद्दारी की और अंग्रेज़ों से मिल गया।
संधि
मैसूर की तीसरी लड़ाई में भी जब अंग्रेज़ टीपू को नहीं हरा पाए तो उन्होंने मैसूर के इस शेर से 'मंगलोर की संधि' नाम से एक समझौता कर लिया। संधि की शर्तों के अनुसार दोनों पक्षों ने एक दूसरे के जीते हुए प्रदेशों को वापस कर दिया। टीपू ने अंग्रेज़ बंदियों को भी रिहा कर दिया। टीपू के लिए यह संधि उसकी उत्कृष्ट कूटनीतिक सफलता थी। उसने अंग्रेज़ों से अलग से एक संधि कर मराठों की सर्वोच्चता को अस्वीकार कर दिया। इस संधि से गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्सअसहमत था। उसने संधि के बाद कहा-
"यह लॉर्ड मैकार्टनी कैसा आदमी है। मैं अभी भी विश्वास करता हूँ कि वह संधि के बावजूद कर्नाटक को खो डालेगा।"
टीपू सुल्तान
'पालक्काड क़िला', 'टीपू का क़िला' नाम से भी प्रसिद्ध है। यह पालक्काड टाउन के मध्य भाग में स्थित है। इसका निर्माण 1766 में किया गया था। यह क़िला भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के अंतर्गत संरक्षित स्मारक है। मैसूर के सुल्तान हैदर अली ने इस क़िले को 'लाइट राइट' यानी 'मखरला' से बनवाया था। जब हैदर ने मालाबार और कोच्चि को अपने अधीन कर लिया, तब इस क़िले का निर्माण करवाया। उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने भी यहाँ अधिकार जमाया था। पालक्काड क़िला टीपू सुल्तान का केरल में शक्ति-दुर्ग था, जहाँ से वह ब्रिटिशों के ख़िलाफ़ लड़ता था। इसी तरह सन 1784 में एक युद्ध में कर्नल फुल्लेर्ट के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने 11 दिन दुर्ग को घेर कर रखा और अपने अधीन कर लिया। बाद में कोष़िक्कोड के सामूतिरि ने क़िले को जीत लिया ।1790 में ब्रिटिश सैनिकों ने क़िले पर पुनः अधिकार कर लिया। बंगाल में 'बक्सर का युद्ध' को तथा दक्षिण में मैसूर का चौथा युद्ध को जीत कर भारतीय राजनीति पर अंग्रेज़ों ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली।
टीपू सुल्तान का मक़बरा,श्रीरंगपट्टनम
'फूट डालो, शासन करो' की नीति चलाने वाले अंग्रेज़ों ने संधि करने के बाद टीपू से गद्दारी कर डाली। ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के साथ मिलकर चौथी बार टीपू पर ज़बर्दस्त हमला किया और आख़िरकार 4 मई सन् 1799 ई. को मैसूर का शेर श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए शहीद हो गया। 1799 ई. में उसकी पराजय तथा मृत्यु पर अंग्रेज़ों ने मैसूर राज्य के एक हिस्से में उसके पुराने हिन्दू राजा के जिस नाबालिग पौत्र को गद्दी पर बैठाया, उसका दीवान पुरनिया को नियुक्त कर दिया।
टीपू की असफलता के कारण
टीपू सुल्तान की असफलता के दो महत्त्वपूर्ण कारण थे-
  • फ़्राँसीसी मित्रता और देशी राज्यों को मिलाकर संयुक्त मोर्चा बनाने में टीपू असफल रहा।
  • वह अपने पिता हैदर अली की भांति कूटनीतिज्ञ और दूरदर्शिता का पक्का नहीं था।
विकास कार्य
टीपू की शहादत के बाद अंग्रेज़ श्रीरंगपट्टनम से दो रॉकेट ब्रिटेन के 'वूलविच संग्रहालय' की आर्टिलरी गैलरी में प्रदर्शनी के लिए ले गए। सुल्तान ने 1782 में अपनेपिता के निधन के बाद मैसूर की कमान संभाली थी और अपने अल्प समय के शासनकाल में ही विकास कार्यों की झड़ी लगा दी थी। उसने जल भंडारण के लिएकावेरी नदी के उस स्थान पर एक बाँध की नींव रखी, जहाँ आज 'कृष्णराज सागर बाँध' मौजूद है। टीपू ने अपने पिता द्वारा शुरू की गई 'लाल बाग़ परियोजना' को सफलतापूर्वक पूरा किया। टीपू निःसन्देह एक कुशल प्रशासक एवं योग्य सेनापति था। उसने 'आधुनिक कैलेण्डर' की शुरुआत की और सिक्का ढुलाई तथा नाप-तोप की नई प्रणाली का प्रयोग किया। उसने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम में 'स्वतन्त्रता का वृक्ष' लगवाया और साथ ही 'जैकोबिन क्लब' का सदस्य भी बना। उसने अपने को नागरिक टीपू पुकारा। टॉमस मुनरो ने टीपू के बारें में लिखा है कि-
"नवीनता की अविभ्रांत भावना तथा प्रत्येक वस्तु के स्वयं ही प्रसूत होने की रक्षा उसके चरित्र की मुख्य विशेषता थीं।


ईस्ट इण्डिया कम्पनी


ईस्ट इण्डिया कम्पनी (अंग्रेज़ी: East India Company)  एक निजी व्यापारिक कम्पनी थी, जिसने 1600 ई. में शाही अधिकार पत्र द्वारा व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। इसकी स्थापना 1600 ई. के अन्तिम दिन महारानी एलिजाबेथ प्रथम के एक घोषणापत्र द्वारा हुई थी। यह लन्दन के व्यापारियों की कम्पनी थी, जिसे पूर्व में व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया गया था। कम्पनी का मुख्य उद्देश्य धन कमाना था। 1708 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की प्रतिद्वन्दी कम्पनी 'न्यू कम्पनी' का 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी' में विलय हो गया। परिणामस्वरूप 'द यूनाइटेड कम्पनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग टू ईस्ट इंडीज' की स्थापना हुई। कम्पनी और उसके व्यापार की देख-रेख 'गर्वनर-इन-काउन्सिल' करती थी।

कम्पनी का भारत आगमन

1608 ई. में कम्पनी का पहला व्यापारिक पोत सूरत पहुँचा, क्योंकि कम्पनी अपने व्यापार की शुरुआत मसालों के व्यापारी के रूप में करना चाहती थी।

व्यापार के लिए संघर्षकम्पनी ने सबसे पहले व्यापार की शुरुआत मसाले वाले द्वीपों से की। 1608 ई. में उसका पहला व्यापारिक पोत सूरत पहुँचा, परन्तु पुर्तग़ालियों के प्रतिरोध और शत्रुतापूर्ण रवैये ने कम्पनी को भारत के साथ सहज ही व्यापार शुरू नहीं करने दिया। पुर्तग़ालियों से निपटने के लिए अंग्रेज़ों को डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सहायता और समर्थन मिला और दोनों कम्पनियों ने एक साथ मिलकर पुर्तग़ालियों से लम्बे अरसे तक जमकर तगड़ा मोर्चा लिया। 1612 ई. में कैप्टन बोस्टन के नेतृत्व में अंग्रेज़ों के एक जहाज़ी बेड़े ने पुर्तग़ाली हमले को कुचल दिया और अंग्रेज़ों की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सूरत में व्यापार शुरू कर दिया। 1613 ई. में कम्पनी को एक शाही फ़रमान मिला और सूरत में व्यापार करने का उसका अधिकार सुरक्षित हो गया। 1622 ई. में अंग्रेज़ों ने ओर्मुज पर अधिकार कर लिया, जिसके फलस्वरूप वे पुर्तग़ालियों के प्रतिशोध या आक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित हो गये।कम्पनी की सफलताएँ1615-18 ई. में सम्राट जहाँगीर के समय ब्रिटिश नरेश जेम्स प्रथम के राजदूत सर टामस रो ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए कुछ विशेषाधिकार प्राप्त कर लिये। इसके शीघ्र बाद ही कम्पनी ने मसुलीपट्टम और बंगाल की खाड़ी स्थित अरमा गाँव नामक स्थानों पर कारख़ानें स्थापित किये। किन्तु कम्पनी को पहली महत्त्वपूर्ण सफलता मार्च, 1640 ई. में मिली, जब उसने विजयनगर शासकों के प्रतिनिधि चन्द्रगिरि के राजा से आधुनिक चेन्नई नगर का स्थान प्राप्त कर लिया। जहाँ पर उन्होंने शीघ्र ही सेण्ट जार्ज क़िले का निर्माण किया। 1661 ई. में ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय को पुर्तग़ाली राजकुमारी से विवाह के दहेज मेंबम्बई का टापू मिल गया। चार्ल्स ने 1668 ई. में इसको केवल 10 पाउण्ड सालाना किराये पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिया। इसके बाद 1669 और 1677 ई. के बीच कम्पनी के गवर्नर जेराल्ड आंगियर ने आधुनिक बम्बई नगर की नींव डाली।
1687 ई. में कम्पनी के एक वफ़ादार सेवक जॉब चारनाक ने बंगाल के नवाब इब्राहीम ख़ाँ के निमंत्रण पर भागीरथी की दलदली भूमि पर स्थित सूतानाती गाँव मेंकलकत्ता नगर की स्थापना की। बाद को 1698 ई. में सूतानाती से लगे हुए दो गाँवों, कालिकाता और गोविन्दपुर, को भी इसमें जोड़ दिया गया। इस प्रकार पुर्तग़ालियों के ज़बर्दस्त प्रतिरोध पर विजय प्राप्त करने के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 90 वर्षों के अन्दर तीन अति उत्तम बन्दरग़ाहों-बम्बई, मद्रास और कलकत्ता पर अपना अधिकार कर लिया। इन तीनों बन्दरग़ाहों पर क़िले भी थे। ये तीनों बन्दरग़ाह प्रेसीडेंसी कहलाये और इनमें से प्रत्येक का प्रशासन ईस्ट इण्डिया कम्पनी के 'कोर्ट ऑफ़ प्रोपराइटर्स' द्वारा नियुक्त एक गवर्नर के सुपुर्द किया गया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी का संचालन लन्दन में 'लीडल हॉल स्ट्रीट' स्थित कार्यालय से होता था।
कम्पनी को सीमा शुल्क से मुक्ति
1691 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल के नवाब इब्राहीम ख़ाँ से एक फ़रमान प्राप्त हुआ, जिसमें कम्पनी को बंगाल में सिर्फ़ 3000 रुपये की राशि सालाना देने पर सीमा शुल्क के भुगतान से मुक्त कर दिया गया था। अन्य यूरोपीय कम्पनियों को तीन प्रतिशत शुल्क अदा करना पड़ता था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के सर्जन 'डॉ. हैमिल्टन'[1] की चिकित्सा सेवाओं से ख़ुश होकर सम्राट फ़र्रुख़सियर ने 1715 ई. में नया फ़रमान जारी करते हुए कम्पनी को सीमा शुल्क से मुक्त करने वाले पहले फ़रमान की पुष्टि कर दी।
व्यापार में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के इस एकाधिकार का कई अंग्रेज़ व्यापारियों ने विरोध किया और सत्रहवीं शताब्दी के अन्त में 'दि इण्डियन कम्पनी ट्रेडिंग टु दि ईस्ट इण्डीज़' नामक एक प्रतिद्वन्द्वी संस्था की स्थापना की। नयी और पुरानी दोनों कम्पनियों में कड़ी प्रतिद्वन्द्विता चल पड़ी, जिसमें पुरानी कम्पनी के पैर उखड़ने लगे, किन्तु भारत और इंग्लैण्ड दोनों ही जगह अत्यन्त कटु और अप्रतिष्ठाजनक प्रतिद्वन्द्विता के बाद 1708 ई. में समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत दोनों को मिलाकर एक कम्पनी बना दी गई और उसका नाम रखा गया 'दि यूनाइडेट कम्पनी ऑफ़ दि मर्चेण्ट्स ऑफ़ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग टू दि ईस्ट इण्डीज़'। यह संयुक्त कम्पनी बाद में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के नाम से ही मशहूर रही और डेढ़ सौ वर्षों में वह मात्र एक व्यापारिक निगम न रहकर एक ऐसी राजनीतिक एवं सैनिक संस्था बन गई, जिसने सम्पूर्ण भारत पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर ली।
Blockquote-open.gif 1661 ई. में ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय को पुर्तग़ाली राजकुमारी से विवाह के उपलक्ष्य में दहेज स्वरूप बम्बई का टापू मिल गया था। चार्ल्स द्वितीय ने 1668 ई. में इसको केवल 10 पाउण्ड सालाना किराये पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दे दिया। इसके बाद 1669 और 1677 ई. के बीच कम्पनी के गवर्नर जेराल्ड आंगियर ने आधुनिक बम्बई नगर की नींव डाली। Blockquote-close.gif
कम्पनी का स्वरूप
कम्पनी के साधारण सदस्यों की एक सभा थी, जिसके कार्य का नियंत्रण एक गवर्नर और चौबीस समितियों को दिया गया था। ये चौबीस समितियाँ चौबीस व्यक्ति थे, जिन्हें बाद में 'निदेशक' कहा जाने लगा और उनकी सभा को 'निदेशक मंडल'। निदेशक का कार्यकाल एक वर्ष का होता था, और वे अगले वर्ष के लिए पुनः चुने जा सकते थे। कम्पनी मात्र एक व्यापारिक संस्था थी। उसे केवल व्यापारिक निकायों के लिए मान्य विधायी और न्यायिक अधिकार प्राप्त हुए थे। इसके अंतर्गत उसे कारावास और अर्थदंड आरोपित करने की शक्ति अंग्रेज़ क़ानूनों के अंतर्गत प्रदान की गई थी। 1635 मेंइंग्लैण्ड में एक और कम्पनी को अनुमति प्राप्त हो गई, जिससे पुरानी कम्पनी को कठिनाई हुई और दोनों कम्पनियों में प्रतिद्वंदिता होने लगी। जिसका निराकरण करने का प्रयत्न किया गया, जिससे भविष्य की 'ज्वाइंट स्टॉक' कम्पनियों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। 1662 ई. में जार्ज आक्सेनडेन कम्पनी की फ़ैस्ट्री का अध्यक्ष बनाया गया था। 1694 में इंग्लेंड के हाउस ऑफ कॉमन्स में प्रस्ताव आया कि इंग्लेंड के प्रत्येक नागरिक को विश्व के किसी भाग में व्यापार करने का अधिकार है, यदि संसद उसे प्रतिबंधित न कर दे। इस प्रस्ताव के उपरांत 1698 में एक और कम्पनी 'दी इंग्लिश कम्पनी ट्रेडिंग टू दी ईस्ट इंडीज' की स्थापना हुई, जिससे लंदन कम्पनी संकट में आ गई 1709 में दोनों कम्पनियों का विलीनीकरण हुआ और 'दी युनाइटेड ईस्ट इण्डिया कम्पनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ इंग्लेंड ट्रेडिंग टू ईस्ट इंडीज' अस्तित्व में आई और ईस्ट इण्डिया कम्पनी के नाम से विख्यात हुई। 1717 ई. में ही कम्पनी ने दस्तक प्रक्रिया शुरू कर दी थी।[2]
कम्पनी का सौभाग्य
भारत में इस कम्पनी की प्रभुसत्ता सहसा ही नहीं स्थापित हो गई। इसमें उसे सौ से भी अधिक वर्षों का समय लगा और इस अवधि में उसे फ़्राँस और डचकम्पनियों तथा भारतीयों से अनेक युद्ध भी करने पड़े। यह ईस्ट इण्डिया कम्पनी कम्पनी का सौभाग्य ही था कि, भारत पर प्रभुसत्ता का दावा करने वाली मुग़लसरकार धीरे-धीरे कमज़ोर होती गई और देश अठारहवीं शताब्दी के दौरान छोटे-छोटे अनेक मुस्लिम और हिन्दू राज्यों में बँट गया। इन राज्यों में परस्पर कोई भी एकता न रही। मुस्लिम राज्य न केवल हिन्दू राज्यों के ख़िलाफ़ थे, वरन उनमें आपस में भी एकता न थी और न ही उनके मन में दिल्ली में शासन करने वाले मुग़ल सम्राट के प्रति कोई निष्ठा थी। यह फूट ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए वरदान सिद्ध हुई। जून 1756 ई. में जब नवाब सिराजुद्दौला ने कलकत्ता पर हमला किया, तो ईस्ट इण्डिया कम्पनी के फ़ोर्ट विलियम का गवर्नर ड्रेक रोगर था। इस कम्पनी ने 1761 ई. में वॉडीवाश का युद्ध जीतकर फ़्रेंच ईस्ट इण्डिया कम्पनी का भारत से सफ़ाया कर दिया। सन् 1757 ई. में प्लासी का युद्ध जीतने के बाद बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर उसका प्रभुत्व वस्तुत: पहले ही स्थापित हो चुका था। विलियम नाट (1782 से 1845 ई. तक) ईस्ट इण्डिया कम्पनी की बंगाल सेना में 1800 ई. में एक सैनिक पदाधिकारी होकर आया। इसकी अतिशीघ्र पदोन्नति हुई और 1839 ई. में उसे कंदहार स्थित ब्रिटिश सेनाओं का नेतृत्व सौंपा गया। इसी समय पर कम्पनी ने सैम्युअल आकमटी को मद्रास का सेनापति नियुक्त किया था।
कम्पनी का वर्चस्व
मुग़ल सम्राट शाहआलम द्वितीय असहाय सा कम्पनी की फ़ौजों का बढ़ाव और विजय देखता रहा। उसके देखते-देखते कम्पनी ने मैसूर के मुस्लिम राज्य को हड़प लिया और हैदराबाद के निज़ाम ने कम्पनी के आगे आत्म समर्पण कर दिया। पर वह कुछ भी न कर सका। हाँ, उसे इस बात से अलबत्ता कुछ सन्तोष मिला कि कम्पनी ने मराठों की शक्ति को भी काफ़ी क्षीण कर दिया था। राजपूत वीरे थे, किन्तु शुरू से ही उनमें आपस में फूट थी। उन्होंने आत्मरक्षा के लिए कोई वार किये बिना ही कम्पनी के आगे घुटने टेक दिये। इसी समय डेविड आक्टरलोनी, जो कम्पनी की सेवा में एक मुख्य सेनानायक था, मराठों से दिल्ली की रक्षा की।वारेन हेस्टिंग्स (1813-23) के प्रशासन काल में मराठों द्वारा आत्म समर्पण कर दिये जाने के बाद तो मुग़ल सम्राट वस्तुत: कम्पनी का पेंशनयुक्त बन गया। 1929 ई. में आसाम, 1843 ई. में सिन्ध, 1849 ई. में पंजाब और 1852 ई. में दक्षिणी बर्मा भी कम्पनी के शासन में आ गया। वास्तव में अब बर्मा (वर्तमानम्यांमार) से पेशावर तक कम्पनी का पूर्ण आधिपत्य था।
Main.jpg मुख्य लेख : सिपाही विद्रोह
ईस्ट इण्डिया कम्पनी से व्यापारिक अधिकार और एकाधिपत्य पहले ही हस्तान्तरित किया जा चुका था और इस प्रकार वह ग्रेट ब्रिटेन के सम्राट के प्रशासनिक अभिकरण के रूप में कार्य कर रही थी। कम्पनी के शासनकाल में कई पूर्वी विद्रोह हुए थे। जिस समय चारों तरफ़ शान्ति नज़र आ रही थी, उसी समय अचानक 1857 ई. में भारतीय सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। ब्रिगेडियर नील जेम्स ने 11 जून, 1857 ई. को इस विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया। कम्पनी ने कुछ 'गद्दार' भारतीयों की मदद से विद्रोह को दबा तो दिया, लेकिन भारतीयों के कुछ वर्गों में विरोध और बग़ावत की आग भड़कती रही। यह बग़ावत ईस्ट इण्डिया कम्पनी के लिए घातक सिद्ध हुई। 1858 ई. में कम्पनी को समाप्त कर दिया गया और भारत की प्रभुसत्ता ब्रिटेन के सम्राट ने स्वयं ग्रहण कर ली।

कोलकाता नगर की स्थापना

भारत पर प्रभुसत्ता

सिपाही विद्रोह